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Home विशेष उल्लेख टाजर्न लेडी के सामने झुकी यूनिवर्सिटी

टाजर्न लेडी के सामने झुकी यूनिवर्सिटी

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टाजर्न लेडी के सामने झुकी यूनिवर्सिटी

शैलेंद्र

केबीसी में अमिताभ ने सुनायी मधुबाला की कहानी

स्त्री यानी मां, वात्सल्य, प्रेम, त्याग, खुशी.. न जाने और कितने नाम. शायद नहीं कर बांध सकते उसे शब्दों में. आज जब वक्त बदला है, तो उसकी भूमिका भी बदली है. शारदीय नवरात्र के उपलक्ष्य में ‘शक्तिशालिनी ’ श्रृंखला की सातवीं कड़ी में आज पढ़ें बिहार के सीतामढ़ी की मधुबाला की कहानी.

मुजफ्फरपुर : 2008 में जब मधुबाला ने गोयनका कॉलेज में स्नातक अंतिम वर्ष की परीक्षा दी, तो उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि वो बड़ी मुश्किल में फंसने जा रही है.

जब नतीजा आया, तो उसका रिजल्ट रोक दिया गया था. पता चला, फस्ट इयर में फेल होने के कारण रिजल्ट रुका है. मधुबाला की तीन साल की मेहनत पर पानी फिरनेवाला था. लोगों ने सलाह दी कि फिर से स्नातक में कर लो. यूनिवर्सिटी से अब कुछ नहीं हो सकता, लेकिन मधुबाला ने ठान लिया कि वह फिर से स्नातक नहीं करेगी, बल्कि यूनिवर्सिटी को कारण बताने को मजबूर कर देगी.

सीतामढ़ी की मधुबाला का जीवन परीक्षा फल रुकने के बाद बदल चुका गया. वह लगातार मुजफ्फरपुर में यूनिवर्सिटी का चक्कर लगाने लगी. सप्ताह में कई बार विश्वविद्यालय आना पड़ता.

अधिकारी अब आना, तब आना की बात कह रहे थे. लेकिन मधुबाला ने हार नहीं मानी. दिन-महीने व साल बीत रहे थे, लेकिन उसका हौसला कम नहीं हुआ. वह हर बार यही सवाल करती, आखिर फस्र्ट इयर में फेल होने के बावजूद उसे फाइनल इयर में परीक्षा कैसे देने दी गयी?

तीन साल लगाया चक्कर

2008 से लेकर 2011 तक मधुबाला यूनिवर्सिटी का चक्कर लगाती रही. अधिकारियों को जब ये महसूस हो गया कि वो हार नहीं माननेवाली, तो 2012 की विशेष परीक्षा में बैठने की छूट मधुबाला को दी गयी. मधुबाला ने इसे स्वीकार कर लिया. मधुबाला बताती हैं कि इसके अलावा मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था. हमने परीक्षा दी और पास हो गये. हमें यूनिवर्सिटी को मार्कसीट देनी पड़ी. हमने जो ठाना था, उसे पूरा किया.

पति ने दिया साथ

गोयनका कॉलेज में पढ़नेवाली मधुबाला ने कम उम्र में ही पुरुषोत्तम से प्रेम विवाह किया.पति पुरुषोत्तम उनका पूरा साथ देते हैं. वो खुद को कहीं नौकरी नहीं करते, लेकिन मधुबाला को आगे बढ़ाने में पूरा सहयोग कर रहे हैं. मधुबाला कहती हैं कि अपने संघर्ष के दिनों में मैं नेहरू युवा केंद्र से जुड़ी. कंप्यूटर डिप्लोमा किया. इससे परिवार चलाने के लिए मुङो महीने में ढाई हजार रुपये मिलने लगे थे.

आपको क्यों दे नौकरी?

स्नातक बनने के बाद मधुबाला नौकरी की तलाश में थी. उसी दौरान शिवहर में एड्स काउंसेलर की जगह निकली. मधुबाला पति के साथ इंटरव्यू देने पहुंच गयीं. 45 अभ्यर्थियों के बीच जब उसके इंटरव्यू का नंबर आया, तो आधा दर्जन एक्सपर्ट्स में से पहला सवाल यही आया, यहां आप से ज्यादा योग्यता वाले प्रतिभागी है. ऐसे में आपको क्यों नौकरी दें?

मधुबाला ने उत्तर दिया, जब नये व्यक्ति को मौका मिलता है, तभी उसकी योग्यता बढ़ती है. इससे इंटरव्यू पैनल में बैठे एक्सपर्ट काफी प्रभावित हुए. उन्होंने अपनी जगह पर खड़े होकर तालियां बजा कर मधुबाला का हौसला बढ़ाया. मधुबाला ने कहा, इससे हमें लग गया कि हमारा इंटरव्यू अच्छा गया है. बाद में जब परिणाम आया, तो मेरा चुनाव हो गया था.

बन गयी टाजर्न लेडी

नौकरी के शुरुआती दिनों में पति पुरुषोत्तम मधुबाला को शिवहर छोड़ने व ले जाने आते थे. ये सिलसिला दो माह तक चला. इसके बाद स्कूटी आ गयी. अब भी पति पुरुषोत्तम ही मधुबाला को ड्यूटी पर लाते, ले जाते थे, लेकिन एक दिन उन्होंने कहा, कितने दिन हम ऐसे ही तुमको लेकर आते-जाते रहेंगे. इस पर मधुबाला ने स्कूटी की चाबी थाम ली और ऑफिस के लिए निकल पड़ी. उस दिन से अब तक वो अकेले ऑफिस आती जाती हैं. बिना किसी डर भय के, जबकि जिस तरह का ये इलाका है. उसमें कोई महिला ऐसी हिम्मत नहीं करेगी. मधुबाला के इसी हिम्मत को देखते हुए यहां के लोग उसे टाजर्न लेडी के नाम से बुलाते हैं.

पहुंच गयीं केबीसी

मधुबाला इस साल केबीसी के पहले एपिसोड में शामिल हुई. वो हॉट सीट पर बैठीं. साढ़े तीन लाख रुपये जीते. शो के होस्ट अमिताभ बच्चन ने बड़े गर्व के साथ मधुबाला की कहानी को देश-दुनिया के सामने रखा. इस दौरान मधुबाला ने अपने उन सपनों का जिक्र भी किया, जिन्हें वो पूरा करना चाहती है. मधुबाला कहती है, जब हम मां कुमारी सरोज के गर्भ में थे, तब उन्हें एएनएम की नौकरी मिली थी, लेकिन उन्होंने मेरी वजह से नौकरी नहीं की थी. इसके बाद जब हमने मां को अपनी मर्जी से शादी के बारे में बताया, तो उन्होंने कहा, उसके जन्म के बारे में बताया और कहा, अगर तुम कुछ नहीं कर सकी, तो हम हार जायेंगे. अब जब मधुबाला आगे बढ़ रही हैं, तो उनकी मां को सबसे ज्यादा खुशी होती है.

चाहती हैं नीली बत्ती

मधुबाला कहती हैं, हम समाज की सोच व व्यवस्था बदलना चाहते हैं. इसके लिए मुङो सिविल सेवा की नौकरी की जरूरत है. उम्र के साथ जिम्मेवारियां भी बढ़ी हैं, लेकिन मैंने हार नहीं मानी है. मेरी चाहत है, मैं अधिकारी बन कर समाज के लिए कुछ काम कर सकूं. मैं जब बड़े अधिकारियों की गाड़ी में नीली बत्ती लगी देखते हैं, तो वो मुङो आकर्षित करती है. मुङो लगता है, मुङो उसे हासिल करने के लिए लगातार मेहनत करनी चाहिए.

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