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नैतिक शक्ति कभी बेकार नहीं जाती

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नैतिक शक्ति कभी बेकार नहीं जाती
19 मार्च 1919 को गांधी जब एक बैठक के सिलसिले में मद्रास गये हुए थे, तब उन्हें अपने मेजबान सी रोजगोपालाचारी के समक्ष यह टिप्पणी करते हुए सुना गया कि “ पिछली रात एक सपने में मुझे यह विचार आया कि हमें देश में एक आम हड़ताल का आह्वान करना चाहिए.” देशमें गांधी का यह पहला सविनय अवज्ञा आंदोलन था. इस विचार को भड़काने वाला था रॉलेट एक्ट, जो एक दिन पहले ही क्रियान्वित हुअ था.
पहला विश्वयुद्ध नवंबर 1918 में समाप्त हो चुका था, लेकिन अखबारों की युद्धकालीन सेंसरशिप के साथ-साथ गिरफ्तारी और नागरिक स्वतंत्रता को स्थगित करने की आपात शक्तियां अभी भी कायम थीं. ब्रिटेन ने न्याय-प्रशासन की समीक्षा के लिए सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में एक समिति हिंदुस्तान भेजी थी. इस समिति ने युद्धकालीन प्रतिबंधों को जारी रखने की सिफारिश की थी. गांधी ने एक गंभीर बीमारी से उबर रहे थे, किंतु अभी भी कमजोर बने हुए थे. तब भी वे सरकार पर इस दमनकारी कानून को वापस लेने का दबाव डालने के उद्देश्य से राष्ट्रव्यापी हड़ताल की तैयारी में जुट गये. उन्होंने कई शहरों की यात्राएं की, बावजूद इसके कि वे इतने कमजोर थे कि उनके लिखित भाषणों को किसी आन्य को पढ़ना होता था.
इस अन्यायपूर्ण और विनाशकारी कानून को निरस्त करने के आग्रह के साथ जो खत उन्होंने वायसराय को भेजे थे, उन पर कोई ध्यान नहीं दिया गया था. हड़ताल का सविनय ‌अवज्ञा का गांधी का आह्वान हिंदुस्तान भर में आग की तरह फैल गया. इसने एक सार्वजनिक ध्येय के पक्ष में बड़ी तादाद में लोगों को संगठित कर उनमें उनकी तातक का अहसास जगा दिया. यह हड़ताल 6 अप्रैल को शुरू हुई और इसने अर्थव्यवस्था को पमगु बना दिया. वीरान पड़े शहर इस बात का सबूत थे कि शांतिपूर्ण विरोध के लिए संगठित हिंदुस्तानी एक अपराजेय शक्ति साबित हो सकते थे.
इस तरह की हड़ताल के बारे में हिंदुस्तान में कभी सोचा भी नहीं गया था. एक खत में गांधी ने लिखा था कि वे अंग्रेजों को यह दिखा देने की उम्मीद कर रहे थे कि “नैतिक शक्ति के सामने भौतिक शक्ति कुछ भी नहीं है और यह कि नैतिक शक्ति कभी बेकार नहीं जाती.” हड़ताल के दौरान हिंसा की वारदात हुई, जिनकी गांधी ने निंदा की, लेकिन वे उन्हें रोक नहीं सके. 18 अप्रैल को उन्होंने इस मुहिम को वापस ले लिया.
(साभारः गांधी एक सचित्र जीवनी.
लेखकः प्रमोद कपूर)
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