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बाजार की मजबूरी में हिंदी से प्रेम

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बाजार की मजबूरी में हिंदी से प्रेम
राजेश प्रियदर्शी
वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी
दशकों से भारत का कॉर्पोरेट सेक्टर इस धारणा को साबित करने में काफी हद तक कामयाब रहा था कि हिंदी का बाजार बड़ा तो है, लेकिन हिंदी वाला ग्राहक अंग्रेजी वाले के मुकाबले हीन है. हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी अखबारों के विज्ञापन के रेट इस बात को पुख्ता तौर पर साबित करते रहे. हिंदी के अखबारों-पत्रिकाओं में काम करनेवाले पत्रकारों की तनख्वाह के अंतर में भी यह बात साफ दिखायी देती थी.
इसमें एक बड़ा बदलाव 90 के दशक में आया, जब हिंदी के टीवी चैनलों का दौर आया, अंग्रेजी के अखबार पढ़नेवाले लोग भी हिंदी टीवी चैनल देखने लगे. तब हिंदी के टीवी पत्रकारों का वेतन अंग्रेजी के पत्रकारों के बराबर और कई मामलों में बेहतर हो गया. अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम में पढ़ानेवाला समृद्ध तबका, जो अखबार अंग्रेजी का खरीदता था, वह भी हिंदी टीवी चैनल देख रहा था. यह बाजार से भाषा को मिलनेवाली ताकत का एक नया अध्याय था.
वेबसाइटों की दुनिया में लंबे समय तक अंग्रेजी का दबदबा रहा. हिंदी की इक्का-दुक्का वेबसाइटें थीं और गूगल सर्च में हिंदी के पन्ने पिछले दस सालों में ही दिखने लगे. जब डेस्कटॉप इंटरनेट से मोबाइल इंटरनेट का दौर आया, तो तकरीबन 50 करोड़ की हिंदीवाली आबादी ने अपना जोर दिखाया. आज यूट्यूब से लेकर टिकटॉक तक हिंदी में कंटेंट की भरमार है और लोग हिंदी के जरिये लाखों कमा भी रहे हैं.
दूसरी ओर, मोबाइल पर हिंदी को सुगम बनाने की दिशा में जितना काम होना चाहिए था, वह नहीं हुआ है. ई-कॉमर्स की ज्यादातर कंपनियां अब भी हिंदी वाले ग्राहकों को अंग्रेजी में माल बेच रही हैं. हालांकि हिंदी की डब की हुई विदेशी फिल्मों का बाजार लगातार बढ़ रहा है.
हिंदी बड़ी आबादी की भाषा है, लेकिन ताकतवर लोगों की भाषा नहीं है. हिंदी के हित में जो कुछ हुआ है, वह भाषा के प्रति प्रेम, उसे बोलने-लिखने-पढ़नेवाले लोगों का खयाल रख कर नहीं, बल्कि बाजार की मजबूरी में हुआ है.
दरअसल, भारत का हिंदीभाषी मध्यवर्ग जितनी जल्दी हो सके, अंग्रेजीवाला बन जाना चाहता है. इस समय हिंदी की ताकत वंचित लोगों के संख्याबल में ही है. हिंदी को शायद वही लोग मजबूत बनायेंगे, जो आर्थिक-शैक्षणिक और सामाजिक स्तर पर कमजोर हैं. उन्हें अब अंग्रेजी के भौकाल में पड़ कर झूठमूठ कूल बनने की कोशिश से बचना चाहिए.
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