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सोशल मीडिया है लोकतांत्रिक

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सोशल मीडिया है लोकतांत्रिक

अजीत भारती

संपादक, ऑपइंडिया (हिंदी)
जब हम सोशल मीडिया की बात करते हैं, तो अमूमन हम इसके अनौपचारिक होने पर ज्यादा ध्यान देते हुए यह भूल जाते हैं कि इस माध्यम ने कितने ही लोगों को अभिव्यक्ति का वो जरिया दिया है, जहां वे अपनी आवाज को सशक्तीकृत होते देखते हैं.
चाहे चुनावों के दौरान लगातार होनेवाली चर्चाएं हों, या हर महीने उभरते हुए नये साहित्यकार, सोशल मीडिया ने बहुत तेजी से अपनी जगह व्यापक तौर पर बना ली है. लेकिन, सवाल यह उठता है कि भूले और अनजाने लोगों से आभासी मित्रता की बात करते प्लेटफॉर्म राजनीतिक होकर आखिर ‘मीडिया’ का दायित्व कैसे लेने लगे? मुख्यधारा की मीडिया में पारंपरिक रूप से एकालाप ही हो रहा था.
किसी ने लिख दिया, लोगों को पढ़ना होता था. किसी ने टीवी पर चर्चा कर दी, आपको देखना होता था. आम व्यक्ति कभी भी प्रतिकार नहीं कर पाता था. जो तरीके थे, उसमें से संपादक को चिट्ठी के नाम पर हर दिन पांच लोगों की बात एक पैराग्राफ में आती थी.
‘सूचनाओं का आदान-प्रदान’ में सिर्फ ‘आदान’ ही था, ‘प्रदान’ गायब था. इसी कमी को सोशल मीडिया ने पूरा किया, जहां ‘आप अभी क्या सोच रहे हैं’ की बात निजी दायरे से बाहर निकल कर सामाजिक और राजनीतिक मसलों तक पहुंच गयी. लोगों ने मुखर होकर समर्थन और विरोध जताना शुरू किया.
‘अॉकुपाय वॉल स्ट्रीट’ सरीखे डिजिटल-सोशल आंदोलनों से लेकर ‘अरब स्प्रिंग’, ‘लीबिया की क्रांति’, ‘मिस्र की क्रांति’ इसके उदाहरण हैं कि सोशल मीडिया ने कैसे सत्ता तक को चुनौती दी और पलट दिया. साथ ही ‘एएलएस आइस बकेट चैलेंज’ सरीखे कैम्पेन ने कई जरूरी मुद्दों को सार्वजनिक जीवन के बोलचाल का हिस्सा बनाया. भारत में ‘स्वच्छता अभियान’, ‘सेल्फी विद डॉटर’ आदि ने भी समाज में सकारात्मक जागरूकता फैलायी.
सोशल मीडिया ने कई बार वैसे मसलों को उठाया जिन पर बात नहीं होती थी. इसका परिणाम यह हुआ कि लोगों को यह अहसास हुआ कि सूचना भेजना और पाना, दोनों ही, उनकी हथेली पर मौजूद है.
हाल के दिनों में हर नेता, हर मीडिया चैनल, छोटे-बड़े विचार समूह आदि ने इस अनौपचारिक जगह को अपनी बात करोड़ों लोगों तक पहुंचाने के लिए किया. लोगों ने देश-समाज के भविष्य पर चर्चाएं कीं, राष्ट्र के नेतृत्व पर बहस हुई, रक्षा नीतियों से लेकर वित्त और व्यापार पर आम आदमी अपनी बात रखने में सफल रहा.
पत्रकारिता में ‘डेमोक्रेटाइजेशन ऑफ इन्फॉर्मेशन’ की बात होती है. इसका मतलब है कि सूचना पर सिर्फ कुछ ‘ओपिनियन मेकर्स’ का नियंत्रण न होकर, वृहद् समाज के हर व्यक्ति के पास उसके उपभोग का नियंत्रण होता है.
जब आम आदमी अपने घर के सामने की टूटी सड़क की तस्वीर किसी मीडिया हाउस को भेजता है, और वह खबर बनती है, या जब किसी बड़े एंकर के फेसबुक पोस्ट पर कमेंट के माध्यम से कोई अपनी बात रखता है और एंकर उसे जवाब देता है, तो वह व्यक्ति सशक्त महसूस करता है. वह इस समाज में बदलाव का एक एजेंट बनता है.
साथ ही ‘लाइव’ होने के विकल्पों ने यह सुनिश्चित किया कि कोई भी व्यक्ति अपनी राय रख सकता है. साक्षरता का बंधन टूट गया. हर व्यक्ति अपने आप में एक पत्रकार बन चुका है. वह कैसा पत्रकार है, यह अलग विषय है, लेकिन मीडिया की गेटकीपिंग से तो हम बाहर आ चुके हैं.
साहित्य के क्षेत्र में कई लोग यहीं से अपनी किताबों को लेकर आये. मेरी पहली किताब फेसबुक पर लिखे व्यंग्यों का संकलन है. ऐसे ही, मेरे कई समकालीन साहित्यकार हैं, जिन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी रचनाएं साझा करने से शुरुआत की और आज वे हजारों लोगों द्वारा पढ़े जाते हैं. साहित्य को समृद्ध और नये लेखकों के लेखन की शैली में आये बदलाव के लिए भी सोशल मीडिया काफी हद तक जिम्मेदार है.
हालांकि, सारी बातें सकारात्मक ही नहीं हैं. ब्लॉग लिखने से लेकर, खबरें शेयर करने तक, हमारा समाज अभी पूरी तरह से सोशल मीडिया को लेकर शिक्षित नहीं है.
जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को यह लगता है कि जो भी ‘छपा’ हुआ है, वह सत्य है. किसी तस्वीर पर कुछ लिखा हुआ है, तो उसे लोग सच मान लेते हैं. इस कारण ‘फेक न्यूज’ एक कैंसर के रूप में फैल रहा है. अफवाहों को फैलाने के लिए सोशल मीडिया सबसे बड़ा माध्यम बन चुका है.
यह बात सत्य है कि माध्यम को इस्तेमाल करनेवाला व्यक्ति उस माध्यम की दशा-दिशा तय करता है. कई गैरजिम्मेदाराना बातें भी हुईं हैं, जहां इसका इस्तेमाल सांप्रदायिकता को हवा देने, मजहबी उन्माद फैलाने के लिए भी हुआ है. बावजूद इन घटनाओं के, सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को सशक्त बनाया है.
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