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Home विशेष उल्लेख अलकायदा की धमकी के बाद नेपाल सीमा पर अधिक चौकसी जरूरी

अलकायदा की धमकी के बाद नेपाल सीमा पर अधिक चौकसी जरूरी

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अलकायदा की धमकी के बाद नेपाल सीमा पर अधिक चौकसी जरूरी
सुरेंद्र किशोर,राजनीतिक विश्लेषक
इसी साल फरवरी में यह खबर आयी थी कि बिहार से सटी नेपाल सीमा पर सशस्त्र सीमा बल ने अपनी चौकसी कई गुणा बढ़ा दी है. घुसपैठ व नशीली पदार्थों की तस्करी रोकने को ऐसा किया गया, पर ‘अलकायदा’ की हाल की धमकी के बाद अब सीमा पर खुफिया तंत्र को भी अधिक सशक्त व सक्रिय करने की जरूरत है.
सीमावर्ती पुलिस थानों के प्रभारियों को भी चाहिए कि वे देशभक्त होकर अपनी ड्यूूटी निभाएं जिस तरह भारतीय सेना निभाती है. गत माह एक उच्चस्तरीय बैठक में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अन्य बातों के अलावा यह भी कहा था कि बिहार पुलिस के स्पेशल ब्रांच के खुफिया तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत है.
वैसे स्पेशल ब्रांच में मानव संसाधन बढ़ाने की भी जरूरत पड़ेगी. वैसे केंद्रीय खुफिया एजेंसी एसआइबी भी समानांतर ढंग से अपना काम करती रहती है. इस बीच अंतरराष्ट्रीय आतंकी व जेहादी संगठन ‘अलकायदा’ के प्रमुख जवाहिरी ने भारत के सरकारी ठिकानों और सेना पर हमला करने की धमकी देकर हमें अधिकाधिक सतर्क रहने का अवसर दे दिया है.
कड़ी जांच परीक्षा के बिना ड्राइविंग लाइसेंस देना घातक : दिल्ली में स्वचालित ड्राइविंग लाइसेंस टेस्ट के तीन केंद्र खोले गये हैं. जांच के इस नये तरीके से स्वचालित जांच में शामिल हुए करीब 49 प्रतिशत ड्राइवर फेल कर गये.
पहले जब परंपरागत तरीके से जांच होती थी तो करीब 16 प्रतिशत आवेदनकर्ता ही असफल होते थे. याद रहे कि दिल्ली में हर साल 2000 लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं. इनमें से अधिकतर मामलों में चालकों की ही गड़बड़ी पायी जाती है. इधर बिहार में तो स्वचालित ड्राइविंग जांच परीक्षा का अभी प्रावधान ही नहीं है. यहां तो अधिकतर जिलों में डीटीओ आॅफिस के दलाल किसी भी तरह की जांच के बिना ही स्थायी ड्राइविंग लाइसेंस भी दिलवा देते हैं.
कुछ दशक पहले धनबाद डीटीओ आॅफिस ने लिट्टे के प्रधान प्रभाकरण के नाम भी डीएल जारी कर दिया था. याद रहे कि 2015 के आंकड़े के अनुसार बिहार में करीब 5000 लोग सड़क दुर्घटना में मरे थे. अब तो वह आंकड़ा और भी बढ़ गया है. क्या बिहार में भी आॅटोमेटेड ड्राइविंग लाइसेंस टेस्ट केंद्र खोलने का अवसर नहीं आ चुका है?
लोहिया नगर कब तक रहेगा कंकड़बाग! : मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि पटना के बेली रोड को अब ‘नेहरू पथ’ के नाम से जाना जायेगा. वैसे बहुत पहले उसका नाम पड़ गया था-जवाहर लाल नेहरू पथ. पर,चार शब्दों के उच्चारण में लोगों को दिक्कत आती है. इसलिए वह बेली रोड ही कहा जाता रहा है. अब शायद ‘नेहरू पथ’ प्रचलन में आ जाये. पर यही फाॅर्मूला गार्डिनर रोड पर लागू नहीं हो सकता. उसका नाम पड़ा है वीरचंद पटेल पथ.
उसे यदि पटेल पथ कहा जाने लगे तो कई लोगों को उससे सरदार पटेल का बोध होने लगेगा. पर आश्चर्यजनक बात है कि पटना के कंकड़बाग को आज भी लोहिया नगर नहीं कहा जाता, जबकि सन 1967 में यह नाम पड़ गया था. मौजूदा शासन को चाहिए कि वह लोहिया नगर में जगह-जगह लोहिया नगर का बोर्ड लगवा दे. शायद नयी पीढ़ी की जुबान पर वह नाम भी चढ़ जाये!
नल जल योजना से जुड़ी है सरकार की छवि : बिहार सरकार की नल जल योजना को भारत सरकार ने भी अंगीकार कर दिया है. पूरे देश में इस योजना को लागू किया जाना है पर, दोनों सरकारों को इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इस योजना के साथ उनकी साख भी जुड़ी हुई है.
कहीं ऐसा न हो कि नल के जल के साथ सरकारी भ्रष्टाचार की अविरल धारा की जानकारी घर-घर न पहुंच जाये! जिस तरह इस देश में सरकारों की लगभग हर योजना में भ्रष्टाचार का दीमक लगा हुआ है, उससे यह योजना अछूती कैसे रहेगी? हालांकि, प्रयास करके अछूती रखी जानी चाहिए. बिहार में तो कई जगहों से यह खबर मिलनी शुरू भी हो गयी है कि घटिया पाइप लगाये जा रहे हैं.
यदि यह खबर सही है तो उसका घर-घर में क्या असर होगा? इसलिए केंद्र व राज्य सरकारों को चाहिए कि इस योजना की वे सोशल आॅडिट कराते जाएं, ताकि घर-घर में सरकार की बेहतर छवि बने. वैसे संबंधित मंत्री ने वादा किया है कि इस योजना पर पूरी नजर रखी जायेगी.और अंत में : खनन घोटाले के सिलसिले में सीबीआइ ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री व चार आइएएस अफसरों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है. इस मामले में एक पूर्व मुख्यमंत्री भी देर-सवेर जांच के लपेटे में आ सकते हैं.
हाल के दशकों में सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचार व घोटालों के सिलसिले में कई नेता,अफसर और व्यापारी जेल गये. कुछ जेल यात्रा के कारण ही मरे भी. कुछ अन्य अब भी मुकदमों का सामना कर रहे हैं या जेल में सड़ रहे हैं. कुछ दल व परिवार बर्बाद भी हो रहे हैं.
संकेत साफ है कि अगले चार-पांच साल के भीतर इस देश की अन्य अनेक बड़ी हस्तियां जेल की हवा खाने वाली हैं. इसके बावजूद प्रभावशाली लोगों में अपार धन की हवस कम ही नहीं हो रही है. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या भ्रष्टाचार निरोधक कानून नाकाफी हैं? या, सजा की दर कम है?
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