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Home विशेष उल्लेख राष्ट्रवाद और विकास की बातों से मिली जीत

राष्ट्रवाद और विकास की बातों से मिली जीत

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राष्ट्रवाद और विकास की बातों से मिली जीत

डॉ डीएम दिवाकर
पूर्व निदेशक, एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट, पटना

17वीं लोकसभा के लिए आम चुनाव में 3532 सीटें जीतकर एनडीए की शानदार वापसी नरेंद्र मोदी की करिश्मा के कारण हुआ है. इसे मोदी के राष्ट्रवाद की भावनात्मक राजनीति की सफलता का परिणाम कहें, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. मोदी जनता का विश्वास जीतने में कामयाब हो गये.यद्यपि चुनाव आयोग के अनेक तरह के प्रयासों के बाद भी मतदान के औसत प्रतिशत में कोई महत्वपूर्ण बढ़ोतरी नहीं हुई है. पारंपरिक विश्लेषण में मतदान के प्रतिशत की यथास्थिति में सामान्यत: सत्ताधारी दल की वापसी होती रही है और मतदान प्रतिशत की बढ़ोतरी को परिवर्तन के लिए जनादेश माना जाता रहा है.
एक बार फिर यह सही साबित हुआ है. विशेष बात यह है कि यह जनादेश उन प्रचलित मानस बोध को भी नकारती है, जिसे विरोधी दल उठाते रहे हैं, जैसे कि नोटबंदी से हुए नुकसान से आम लोग नाराज हैं और जीएसटी से छोटे कारोबारी परेशान हैं. किसान संगठनों के विरोधी तेवर और एकजुटता एनडीए को सत्ता से बाहर करेगी और बेरोजगारी में रिकाॅर्ड बढ़ोतरी से नौजवान इस सरकार के खिलाफ मतदान करेगा. इन सभी प्रचलित बातों को यह जनादेश खारिज करती लग रही है.
प्रधानमंत्री मोदी जन-धन योजना, उज्ज्वला, स्वच्छता अभियान, किसान सम्मान योजना, लाभार्थी को सीधे बैंक खाते में धन पहुंचाना आदि प्रत्यक्ष लाभ की योजनाओं द्वारा सबका साथ, सबका विकास के नारे देकर जनता से सीधे भावनात्मक लगाव बनाने में नरेंद्र मोदी कामयाब रहे हैं. जिन्होंने उज्ज्वला योजना में दोबारा गैस रिफिलिंग भले ही नहीं करवायी हो, लेकिन उनके घर में गैस का चूल्हा और सिलिंडर तो मिला है. यह सौगात उन्हें अपनी बेहतरी का एहसास कराता है.
किसान सम्मान योजना में 500 रुपये की दर से दो किस्त कुछ किसानों तक पहुंच गये हैं. बिहार में छात्र के बैंक खाते में साइकिल-पोशाक, छात्रवृत्ति और किताब के लिए पैसे भेजे जा रहे हैं. बिहार में बिजली की आपूर्ति में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है. शराबबंदी और दहेज विरोधी कानून, सात निश्चय योजना आदि का लाभ सबको पहुंचाने का आश्वासन मिला है. इन सबका लाभ आम चुनाव में मिला है.
बिहार में एनडीए का पिछले चुनाव की तुलना में बेहतर प्रदर्शन रहा है. प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्रवाद और नीतीश कुमार के विकास कार्य दोनों के साथ सवर्ण आरक्षण जैसे लुभावन पहल का परिणाम के रूप में देखा जा सकता है. यद्यपि इस आम चुनाव में जदयू-भाजपा के साथ होते हुए भी अपनी मतभिन्नता का एहसास कराती रही है.
चाहे वह बाबरी मस्जिद का मसला हो, धारा 370 हो या सामान नागरिक संहिता का सवाल हो या फिर विशेष राज्य का दर्जा. इन कारणों से जदयू विकास के साथ साथ पिछड़ों, सवर्णों और मुसलमानों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करती रही है. सीट शेयरिंग में बराबरी का दर्जा लेकर जदयू ने अपनी ताकत का संदेश जनता में दिया. इन सभी वजहों से नीतीश कुमार मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में सफल रहे हैं.
यद्यपि हाल के उपचुनावों में जीत से विपक्ष काफी उत्साहित था. लालू प्रसाद का चुनाव के परिदृश्य से अनुपस्थिति से मतदाताओं को एकजुट रखने और महागठबंधन अपनी विरासत बचाने में पूरी तरह से असफल रहा है.
महागठबंधन ने जनता के बीच सत्ता के खिलाफ अनेक सवाल खड़े किये, जैसे लोकतंत्र पर खतरा, संविधान और आरक्षण बचाने की कवायद, नोटबंदी और जीएसटी से परेशानियां, बढ़ती बेरोजगारी, राफेल डील में भ्रष्टाचार, दलितों पर हुए अत्याचार, अल्पसंख्यकों पर उग्र हिंदुत्व का दबाव आदि मसले को जनता में प्रभावी ढंग से नहीं ले जा सका. इसलिए, विपक्ष मतदाताओं का विश्वास जीतने में असफल रहे. यह बात दीगर है कि पिछले चार सालों में विशेष राज्य का दर्जा कभी भी वैसा परवान नहीं चढ़ा जैसा डीएनए के सवाल पर नाखून व बाल के नमूने भेजकर किया गया था. विकास दर को बनाये रखना चुनौती है.
कृषि रोडमैप और कृषि कैबिनेट के बावजूद खेती, खासकर फसल उत्पादन की वृद्धि दर ऋणात्मक है. यद्यपि उम्मीद की जा सकती है कि बिहार में एनडीए का यह समीकरण 2020 के विधानसभा चुनाव में भी बना रहेगा, जिसमें नीतीश कुमार को अगला मुख्यमंत्री का दावेदार बनाकर चुनाव लड़ा जायेगा. साथ ही बिहार को केंद्र से विकास के लिए बेहतर धनराशि के आवंटन का लाभ मिल सकेगा.
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