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होली पर विशेष : बनें रंगों का फव्वारा

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गुरुदेव श्री श्री रविशंकर
होली रंगों का त्योहार है. प्रकृति की भांति विभिन्न रंग हमारी अनुभूतियों और भावनाओं से जुड़े हैं. प्रत्येक व्यक्ति एक रंगों के फव्वारे के समान है, जो बदलते रहते हैं. आपकी इच्छाएं आग की भांति आपको जलाती हैं.
परंतु अगर जीवन होली के समान हो, जहां आप हर रंग को स्पष्ट रूप से देख पाएं तो वे आपके जीवन में आकर्षण लाते हैं. विविधता में सामंजस्य होने से जीवन और जीवंत, आनंद से भरपूर व और भी रंगीन हो जाता है. एक पौराणिक कथा में उस समय का वर्णन किया गया है, जब मां पार्वती तपस्या में थीं व शिव जी समाधि में.
इन दोनों के दिव्य मिलन का अभिनंदन करने वाले प्रेम के देवता, कामदेव को शिव जी भस्म कर देते हैं. पार्वती से मिलन के लिए शिव जी को समाधि से बाहर आना पड़ा. ‘पर्व ‘ का अर्थ है त्योहार और ‘पार्वती’ का अर्थ है जो ‘त्योहार से जन्मा हो’ – यानी उत्सव! समाधि और उत्सव के मिलन के लिए इच्छा का होना भी अनिवार्य था. इसी कारण से इच्छा (काम) का आवाहन किया गया. परंतु उत्सव मनाने के लिए इच्छा से ऊपर उठना आवश्यक है. इसलिए भगवान शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोल कामदेव को भस्म कर दिया. इच्छा होने में कोई बुराई नहीं, परंतु अपनी इच्छाओं को स्वयं पर हावी न होने दें. जब भी इच्छाएं उठें आप यह देखें कि वह इच्छा आपके लिए लाभदायक है या नहीं.
जब इच्छाएं उठती हैं और आप उन्हें अपनी बुद्धि से देखते हैं, तो वह अच्छा है. अगर इच्छा अयोग्य हो, तो वह आपके लिए समस्या का कारण बन जाती है. यह उसी प्रकार है जैसे घोड़ा आपको चला रहा है, आप घोड़े को नहीं.
मुल्ला नसीरुद्दीन की एक कहानी है. मुल्ला एक घोड़े पर सवार थे और घोड़ा गोल-गोल उन्हीं गलियों के चक्कर काट रहा था! तो लोगों ने उनसे पूछा, मुल्ला, आप कहां जा रहे हैं? वे बोले, मुझे नहीं पता, घोड़े से पूछो! अपने जीवन के अधिकतर समय में, हमारी स्थिति भी ऐसी ही होती है. हमारी इच्छाएं हमें चलाती हैं और वे हमें बर्बाद कर देती हैं. इसके बदले हममें इतनी क्षमता होनी चाहिए कि जब हम चाहें तब इच्छाओं का त्याग कर दें, और जब चाहे उन्हें आने दें. हम जब चाहें तो घोड़े पर सवार हो पाएं, और जब न चाहें तो घोड़े से उतर पाएं, बजाय इसके कि हम घोड़े में ही अटक कर रह जाएं या ऐसी परिस्थिति आ जाये कि घोड़ा आपको फेंक दे. यह ज्यादा दुखदायक है.
जब मन में उत्पन्न इच्छा भस्म हो जाती है, तब जीवन में उत्साह आता है और जीवन रंगीन बन जाता है. हमारी चेतना का स्वभाव है उत्साह और जो उत्साह मौन से उत्पन्न होता है, वही सही मायने में उत्साह है. इसी को ध्यान कहते हैं.
जब आप ध्यान करते हैं, आप न केवल अपने भीतर सामंजस्य लाते हैं, आप इस सृष्टि के सूक्ष्म स्तर पर भी प्रभाव डाल रहे हैं, इस सृष्टि के हर स्तर में मौजूद सूक्ष्म जीव पर. ऐसी स्थिति में ही हम अपनी चेतना के उत्थान व जागरूक अवस्थक को देख पाते हैं और यह जान पाते हैं कि यह संपूर्ण सृष्टि केवल चेतना है. अगर किसी भी उत्सव को हम पूजनीयता से और पवित्रता के भाव से मनाएं, तो वह पूर्ण हो जाती है. तब उत्सव केवल शारीरिक या मानसिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि चेतना के स्तर पर मनाया जा सकता है. तब स्वयं ही उत्साह जाग उठता है और जीवन विभिन्न रंगों से भरपूर एक फव्वारा बन जाता है.
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