यह बजट पूरी तरह से चुनावी बजट ही कहा जायेगा. लेकिन, यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बजट का गणित सही नहीं है. कई चीजों में छूट दी गयी है, जिसके लिए सरकार को पैसा लगाना पड़ेगा, मसलन किसानों के लिए 75 हजार करोड़ रुपये बजट रखा गया है, तो यह पैसा कहां से आयेगा. सरकार ने बजट में जितने भी वादे किये हैं, उनको पूरा करने में इतना पैसा खर्च होगा कि इससे राजकोषीय घाटा बढ़ जायेगा, जो कि अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है.
अभी जो राजकोषीय घाटा 3.4 प्रतिशत है, वह चार प्रतिशत के करीब पहुंच जायेगा. दूसरी बात यह है कि जब एक अप्रैल से अगला वित्त वर्ष शुरू होगा, तब बजट में किये गये सारे वादों को पूरा करने के लिए जब तक क्रियान्वयन शुरू होगा, तब तक नयी सरकार आ जायेगी. अब नयी सरकार इन योजनाओं को आगे बढ़ायेगी या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है.
बीते सालों में सरकार ने कई ऐसे वादे किये, जो पूरे नहीं हो पाये. ऐसे में सरकार के दोबारा किये गये इन वादों से जनता का विश्वास कम होगा. जनता के मन में यह बात गहरी बैठ जायेगी कि ये लोग वादे तो बहुत करते हैं, लेकिन उन्हें पूरा नहीं करते. इस स्थिति के चलते इस लोकलुभावन और चुनावी बजट का कोई राजनीतिक फायदा नहीं होगा.
