[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home विशेष उल्लेख मैं फितरत के हर रंग का हूं मुसव्विर

मैं फितरत के हर रंग का हूं मुसव्विर

0
मैं फितरत के हर रंग का हूं मुसव्विर
संजय कुंदन की पहचान मुहब्बत भरे अल्फाजों में जिंदगी को छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी बातें कह डालने वाले शायर के तौर पर है. वह पिछले 40 सालों से लगातार नज्म लिख रहे हैं, इसके बावजूद खुद को शायरी का अभ्यास करने वाला ही कहते हैं. कहते हैं कि अभी तक उनका सुर नहीं निकला है.
शोहरत और वाहवाहियों के प्रलोभन से दूर भावनाओं को नज्मों में जगह देने और उन्हें लोगों तक पहुंचाने में जुटे संजय कुंदन से हमने इस बार खास बातचीत की है.
Qआपकी जिंदगी में शायरी की शुरुआत कैसे हुई?
पिता अपने जमाने के कहानीकार थे. उनकी रचनाएं 30 और 40 के दशक की मशहूर पत्रिकाओं में छपती थीं. फिर बड़ी बहन शायरा हो गयीं, तो समझिए खुद-बखुद घर में पढ़ने और लिखने का माहौल बन गया. उसी जमाने में प्रकाश पंडित ने उर्दू के मशहूर शायरों की नज्मों को देवनागरी में उपलब्ध कराया था, उन्हें पढ़ने लगा और फिर राह उधर ही मुड़ गयी. तब से लगातार लिख रहा हूं. चार किताबें आ चुकी हैं, पांचवी आने वाली है. हालांकि कुछ कहानियां भी पत्रिकाओं में आयी हैं. कांचा इलैया की एक किताब का हिंदी अनुवाद भी किया है.
Qआप शायर तो हैं, मगर किस जुबान के? हिंदी के या उर्दू के?
इस बात पर एक शेर कहूंगा-
जाहिदे तंग नजर ने मुझे काफिर जाना
और काफिर ये समझता है मुसलमां हूं मैं.
दरअसल हिंदी वाले कहते हैं संजय उर्दू का शायर है, क्योंकि मेरी शायरी में उर्दू-फारसी के अल्फाज अधिक आते हैं, जबकि उर्दू वाले कहते हैं कि मैं हिंदी का शायर हूं. उनके ऐसा कहने की वजह यह है कि मैं उर्दू की लिपि फारसी में नहीं लिख कर देवनागरी में लिखता हूं. हालांकि उर्दू के मेरे महबूब शायर सफदर इमाम कादरी ने लिखा है, वो कुंदन जिसे कहते हैं, वह उर्दू का शायर है. अब चूंकि मेरी किताबें देवनागरी में छपी हैं, तो उर्दू वालों के बीच इनका जिक्र कम होता है. अब मेरी किताबें फारसी में लिप्यांतर होकर आ रही हैं.
Qइन दिनों मुशायरों का बड़ा बोलबाला है. इनमें शायरों को दाद भी मिलती है और अच्छी-खासी रकम भी मिल जाती है. आप कभी ऐसे मुशायरों में नजर नहीं आते?
मंचीय मुशायरों का जो अभी दौर है, उसने उर्दू साहित्य को बड़ी क्षति पहुंचायी है. यह बस पापुलरिटी के लिए है. इसमें कई अच्छे शायर भी हैं, मगर ज्यादातर ऐसे शायर हैं, जिनकी शायरी में गहरी अनुभूति नहीं है. वे सिर्फ नाम और यश के लिए शायरी करते हैं. इनमें से ज्यादातर तुकबंद हैं, जबकि मेरे हिसाब से शायरी साधना की चीज है. मंचीय मुशायरे के शायर वाहवाही से अपना असेसमेंट करने लगते हैं, जबकि साहित्य के मूल्यांकन में बरसों लग जाते हैं. अब जैसे नजीर अकबराबादी को उनके अपने वक्त में लोगों ने नहीं पहचाना, मगर अब लोग उनकी कीमत समझ रहे हैं. ऐसे शायर भले देर से पहचाने जाएं, मगर उनकी पहचान टिकाऊ होती है. मंचीय शायरों की पहचान फास्ट फूड टाइप होती है. उनके लिए शायरी बस प्रासंगिकता में बने रहने का मामला है.
Qमगर उर्दू शायरी में तो मुशायरे और तरन्नुम में गाने की परंपरा काफी पुरानी है?
देखिये, तहत और तरन्नुम दो चीजें हैं. मैं तहत को तो ठीक मानता हूं, जिसमें शायरी पढ़ने का अंदाज होता है, मगर तरन्नुम ठीक नहीं है. अगर आपकी आवाज अच्छी है, तो आप अपनी शायरी लोगों को गा कर सुनाते हैं, मगर ऐसे में शायरी के अर्थ के दब जाने का खतरा रहता है. कुछ लोग हाव-भाव भी दिखाने लगते हैं. दाद की फरमाइश करने लगते हैं. मेरे हिसाब से तो ऐसा ज्यादातर वो लोग करते हैं, जिनकी शायरी थोड़ी कमजोर होती है. वे तरन्नुम के सहारे लोगों का अटेंशन लेने की कोशिश करते हैं. यह आत्मविश्वास की कमी का उदाहरण है.
पाकिस्तान के मशहूर शायर हबीब जालिब ने जेल में बैठ कर लिखा था-
जो दर्द के मुतरिब हैं, कशीदे नहीं पढ़ते
वैसे तो शहंशाहों के दरबार बहुत हैं.
अब आज लोग लाख-डेढ़ लाख लेकर मुशायरों में शायरी पढ़ते हैं. वे ऐसा लिख सकते हैं? उनको तो हमेशा वही लिखना होगा, जिस पर तालियां बजे. दाद मिले, जबकि शायरों के लिए निरपेक्ष रहना जरूरी है. हबीब जालिब की तरह. हालांकि अपनी शायरी के बारे में मेरा मानना है कि अभी मैं अभ्यास ही कर रहा हूं, अभी सुर तलाश ही रहा हूं, मिले नहीं हैं.
Qनज्मों के लिए आपका पसंदीदा सब्जेक्ट कौन-सा है?
मैं फितरत के हर रंग का हूं मुसव्विर..
यह मेरे एक नज्म की लाइन है, यानी मैं प्रकृति के हर रंग का मुसव्विर(चित्रकार) हूं. मेरी शायरी में भी वही बात है. मैंने कभी किसी एक विषय को चुन कर नहीं लिखा. मेरी एक किताब में इंकलाबी शायरी मिलेंगी, तो दूसरी में मुहब्बत, दोस्ती और समाज की बातें. मैं किसी एक रंग में नहीं रंगा हूं. एक रंग से दुनिया बनती भी नहीं है.
अब शायरी इसको भले न कहते हों ‘कुंदन’
महसूस किया बस यही फरमाया हुआ है.
Qआज के दौर में शायरी की जरूरत पर आप कुछ कहना चाहेंगे?
जब तक जिस्म में दिल धड़कता रहेगा, शायरी जिंदा रहेगी. राहत इंदौरी और मुनव्वर राणा जैसे शायर आज पाेपुलर हैं. बिहार के नये शायर भी खूब लिख रहे हैं. जैसे, समीर परिमल, अक्स समस्तीपुरी, आराधना प्रसाद, रामनाथ शोधार्थी अच्छा लिख रहे हैं. वहीं मेरे दौर के शायरों में कासिम खुरशीद, आलम खुरशीद, प्रेम किरण और सदफ इकबाल हैं. शायरी आज के दौर में काफी जरूरी है, क्योंकि कारपोरेट दौर में अनुभूतियां कुंद हो रही हैं, जबकि इन अनूभूतियों को शायरी से आवाज मिल सकती है.
ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel