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कालरात्रि

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कालरात्रि

अरिमर्दन कुमार सिंह, कहानीकार

arismathar10@gmail.com
दुर्गा जी का आज ही पट खुला था. पूजा समिति के सदस्य अभी भी चंदा उठाने में लगे हुए थे. सभी रसीद उलट-पलट कर हिसाब लगा रहे थे कि फलाना बाबू के यहां बाकी 500 रुपये, चिलाना बाबू के यहां बाकी 1000 रुपये, अमुक साहब ने तो 2000 रुपये पहले ही दे दिये हैं. मतलब कि आज किसी भी तरह से बाकी चंदे उठा लेने हैं, वर्ना पूजा बाद कोई पत्ता नहीं देगा और तब पूजा समिति को घाटा लगना तय है.
पूजा पंडाल स्टेशन के बगल में था. जोर-जोर से बजते लाउडस्पीकरों के चलते ट्रेन के आने की उद्घोषणा रामलगन के कानों तक नहीं पहुंची.
हठात देखा कि ट्रेन खुल रही है, तो दौड़कर चढ़ने लगा, परंतु पैरों का संतुलन नहीं साध पाया और लड़खड़ाकर ट्रेन के नीचे चला गया. जिंदगी भी लड़खड़ाने वालों से कहां स्नेह करती है! उन्हें तो वह जर्सी गाय के बछड़े और भैंस के पाड़े की तरह समय पाकर दुत्कार देती है. उसे तो बस डार्विनवाद से प्रीत है.
रामलगन के दोनों पैर घुटनों से कट गये. प्लेटफॉर्म पर उसके झोले से जहां-तहां किताबें, पेंसिल, जूते, साड़ी, जलेबी के दो-एक छत्ते, कुछ एक बताशे, एक जोड़ी नकली दांत, दवाइयां बिखर पड़े जो इस बात के सबूत थे कि गिरने वाला जीना चाहता था और वो भी किसी के आंखों की रोशनी था, इंतजार था, सपना था…. वो दर्द से छटपटाता रहा. किसी ने भी मदद नहीं की. शरीर से धीरे-धीरे खून निकलते रहा और अंततः चेतना खो बैठा. यहां तक कि पुलिस वाले भी कन्नी काटते रहे.
कहने लगे कि हॉस्पिटल पहुंचाने के लिए गाड़ी चाहिए और उसका खर्च हम लोगों को नहीं मिलता है. बहुतेरों को अस्पताल ले जाया गया, परंतु कहीं से भी एक पैसा नहीं मिला. अपना पैसा कोई कितना खर्च करेगा. कोई एक दिन का तो है नहीं, आये दिन ऐसी घटनाएं होती रहती हैं. आखिर हमारे भी तो बाल-बच्चे हैं, परंतु सबने पूजा के लिए दो-दो हजार रुपये का चंदा जरूर दिया था.
कालरात्रि की पूजा करताल, ढाक, शंख, उलूक ध्वनि तथा मंत्रोच्चार "या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता……" के बीच जारी था. अगले दिन उसके शव पर कफन के लिए पर्याप्त पैसे चढ़े थे. लोगों ने कहा शुभ दिन को मरा. वैसे रामलगन का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी को हुआ था.
(लेखक कटिहार रेलवे स्टेशन के स्टेशन अधीक्षक हैं.)
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