बंगाल की वोटर लिस्ट से कैसे कटे 27 लाख नाम, सुप्रीम कोर्ट को बताने पहुंचे अधीर रंजन चौधरी

SIR in Bengal: दायर जनहित याचिका में अधीर रंजन चौधरी का दावा है कि मुर्शिदाबाद में लगभग 5 लाख मतदाताओं के नाम मामूली स्पेलिंग की गलती या पते की छोटी-मोटी कमियों का हवाला देकर काट दिए गए.

By Ashish Jha | June 28, 2026 2:07 PM

SIR in Bengal: कोलकाता. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने और नई सरकार के गठन के बाद भी एसआईआर प्रोसेस के दौरान वोटर लिस्ट से लोगों के नाम कटने को लेकर विवाद थम नहीं रहा है. ममता बनर्जी के बाद अब कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने बंगाल की मतदाता सूची से करीब 27 लाख लोगों के नाम हटाए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में नई जनहित याचिका दायर की है.

बिना तय प्रक्रिया के काटे गये नाम

याचिका में लाखों लोगों के नाम का बिना तय प्रक्रिया का पालन किए मनमाने ढंग से काटने का आरोप है. याचिका में कहा गया है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण 2026 प्रक्रिया के तहत बहुत से लोगों के नाम मनमाने ढंग से काटे गए. मुर्शिदाबाद में इसका जबरदस्त प्रभाव दिखा. अकेले वहां लगभग 5 लाख मतदाताओं के नाम मामूली स्पेलिंग की गलती या पते की छोटी-मोटी कमियों का हवाला देकर काट दिए गए. उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का अवसर भी नहीं दिया गया.

लोगों को नहीं मिल रहा सरकारी योजना का लाभ

अधीर रंजन चौधरी ने याचिका में कहा कि आयोग के इस रवैये के कारण लोगों को इससे बहुत परेशानी हुई. वोटर लिस्ट से नाम हटने के कारण बड़ी संख्या में गरीब लोग राशन और वृद्धावस्था पेंशन जैसी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हो रहे हैं. पारदर्शिता की मांग करते हुए अधीर रंजन चौधरी ने कोर्ट से गुहार लगाई. उन्होंने कहा कि इन मामलों की स्थिति, सुनवाई की तारीख और फैसलों की कॉपी देखने के लिए पारदर्शी डिजिटल पोर्टल बनाया जाए ताकि आम जनता को दिक्कत न हो.

पश्चिम बंगाल की अन्य महत्वपूर्ण खबरों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

सुनवाई की गति बढ़ाने की मांग

कांग्रेस नेता ने मां की है कि राज्य में अपीलों और आपत्तियों के सुलझाने के लिए पर्याप्त संख्या में कार्यरत या सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की तैनाती की जाए. कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस टीएस शिवज्ञानम के एसआईआर न्यायाधिकरण से सेवानिवृत्त होने के बाद स्थिति और भी खराब हो गई है. याचिका में कहा गया है कि मुर्शिदाबाद में केवल दो कार्यरत न्यायाधिकरण प्रतिदिन केवल 30-50 मामलों का निपटारा कर रहे हैं. ऐसे में लंबित मामलों को निपटाने में 4 से 5 साल लगेंगे.

Also Read: बंगाल के तलाबों में अब पलने लगी हिलसा मछली, अंतिम चरण में पहुंचा ‘माछेर राजा’ पर शोध