चैत्र नवरात्रि के पांचवें दिन जरूर करें इस कथा का पाठ, वरना स्कंदमाता की पूजा रह जाएगी अधूरी

Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि के पांचवें दिन भक्त स्कंदमाता की कृपा प्राप्त करने के लिए विधि-पूर्वक पूजा करते हैं और व्रत कथा का पाठ करते हैं. मान्यता है कि कथा के पाठ से भक्तों के जीवन में सकारात्मकता और सुख-समृद्धि आती है.

By Neha Kumari | March 23, 2026 9:33 AM

Chaitra Navratri 2026: 19 मार्च से शुरू हुई चैत्र नवरात्रि का आज, 23 मार्च को पांचवां दिन है. आज के दिन माता दुर्गा के स्कंदमाता स्वरूप की पूजा की जाती है. मां की चार भुजाएं हैं और वे कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं, इसलिए इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है. धार्मिक मान्यता है कि माता की आराधना से संतान सुख की प्राप्ति होती है और जीवन से सभी दुखों का नाश होता है. माता की आराधना के समय व्रत कथा का पाठ करना बेहद शुभ होता है. कहा जाता है कि इससे पूजा का फल दोगुना हो जाता है.

मां स्कंदमाता की व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में तारकासुर नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर राक्षस था. उसने कठोर तपस्या के माध्यम से ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और उनसे अमर होने का वरदान मांगा. ब्रह्मा जी ने उसे समझाया कि जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है.

तब चतुराई दिखाते हुए तारकासुर ने वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही संभव हो. उस समय माता सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव गहरे ध्यान और वैराग्य में लीन थे, इसलिए तारकासुर को लगा कि न तो शिव कभी पुनर्विवाह करेंगे और न ही उनका कोई पुत्र होगा.

इस प्रकार वह स्वयं को अजेय मानकर तीनों लोकों में अत्याचार करने लगा और देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया. तारकासुर के आतंक से भयभीत होकर सभी देवता भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के साथ महादेव की शरण में पहुंचे.

देवताओं की करुण पुकार सुनकर और सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान शिव और माता पार्वती का पुनर्मिलन हुआ, जिसके फलस्वरूप कुमार कार्तिकेय (स्कंद) का जन्म हुआ. जब कुमार कार्तिकेय बड़े हुए, तब माता पार्वती ने उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण देने के लिए स्वयं को तैयार किया.

माता ने अपने पुत्र स्कंद को युद्ध कौशल सिखाने के लिए अपनी गोद में लिया, जिससे उनका यह वात्सल्यपूर्ण स्वरूप ‘स्कंदमाता’ के नाम से जगत में विख्यात हुआ. अंततः मां स्कंदमाता के मार्गदर्शन और आशीर्वाद से कार्तिकेय ने भीषण युद्ध में तारकासुर का वध किया और देवताओं को उसके भय से मुक्त कराकर धर्म की पुनः स्थापना की.

मां स्कंदमाता के मंत्र

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया.
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

या देवी सर्वभूतेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता.
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

मां स्कंदमाता का स्वरूप

मां स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं. माता ने अपनी दाईं ओर की ऊपरी भुजा से बाल कार्तिकेय को गोद में धारण किया हुआ है. माता की दो अन्य भुजाओं में कमल के पुष्प सुशोभित हैं और एक भुजा वरमुद्रा में है. मां का वाहन सिंह है. कमल पर विराजमान होने के कारण इन्हें ‘पद्मासना’ भी कहा जाता है.

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