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संतुलन का सध जाना

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जादूगर अनेक चमत्कार दिखाते हैं, लेकिन जादूगर के लिए कोई चमत्कार नहीं है. चमत्कार उसके लिए है, जो जादू नहीं जानता. जब साधारण व्यक्ति भी जादू के नियम जान लेता है, तब उसके लिए भी चमत्कार जैसी कोई बात नहीं रह जाती. कुछ रसायनों का प्रयोग कर सफेद पन्नों पर कुछ लिखा. अक्षर नहीं दिखेंगे. पन्ने को पानी में डूबोते ही अक्षर दिख जायेंगे. देखनेवाले को आश्चर्य-सा लगेगा, किंतु जो व्यक्ति इस विधि को जानता है, उसके लिए कोई आश्चर्य नहीं है, चमत्कार नहीं है. जिस दिन पहली बार आग जली होगी, न जाने कितना बड़ा चमत्कार लगा होगा. अरे! यह प्रकाश! यह ताप! लेकिन आज वही आग चमत्कार की वस्तु नहीं है, क्योंकि सभी उसके नियम को जानते हैं. इसी तरह ध्यान कोई चमत्कार नहीं है. अध्यात्म कोई चमत्कार नहीं है. केवल प्रकृति के नियमों की समझ है. जो नियमों को समझ लेता है, वह बहुत सारी नयी बातें करने में सक्षम होता है.

सामान्य आदमी उन्हें नहीं कर सकता. जो नियमों को नहीं जानता, वह चमत्कार की भ्रांतियों में पलता रहता है. योग कोई चमत्कार नहीं है. यह अध्यात्म विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया है. मनुष्य शरीर से काम लेता है, वाणी और मन से काम लेता है. याेग में कुछ नया करना नहीं होता है. शरीर, वाणी और मन से काम लिया जाता है. किंतु वहां एक बात स्पष्ट समझ लेनी होती है कि किन-किन कारणों से शक्ति सुप्त रहती है और किन-किन कारणों से वह जागती है? जिन-जिन कारणों से सुप्त रहती है, क्षीण होती है, उन कारणों को रोकना होता है, नष्ट करना होता है. इतना करने से योग सध जाता है, हमें केवल संतुलन स्थापित करना पड़ता है.

शरीर से काम लेना है, किंतु ऐसी स्थिति भी आनी चाहिए कि शरीर से कोई काम न लें. शरीर से प्रवृत्ति करनी है, तो शरीर से निवृत्ति भी करनी है. प्रवृत्ति और निवृत्ति का संतुलन. वाणी से काम लेना है, तो मौन भी करना है. अर्थात्, वाक् और मन का संतुलन. इस संतुलन के स्थापित होते ही योग सध जाता है, शक्ति-जागरण का मार्ग खुल जाता है, शक्ति को क्षीण करने के मार्ग बंद हो जाते हैं. शक्ति अर्जित होने लगती है और भीतर विस्फोट होने लगता है. शक्ति जाग उठती है.

आचार्य महाप्रज्ञ

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