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शिवजी की कृपा से मुनि श्वेत ने पाया मृत्यु पर विजय

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शिवजी की कृपा से मुनि श्वेत ने पाया मृत्यु पर विजय

महर्षियों के आग्रह पर एक बार ब्रह्माजी ने श्वेत मुनि की पुण्यप्रद कथा सुनायी. पितामह बोले-समाप्त आयु वाले श्वेत नामक एक श्रीयुक्त मुनि गिरि की गुफा में शिवाराधना में रत थे. हे द्विजो, ह्यनमस्ते रुद्र मन्यवे ह्ण इत्यादि रुद्रध्याय से भक्तिपूर्वक महेश्वर की आराधना करके श्वेत मुनि ने उन्हें प्रसन्न कर लिया. उसके तत्काल बाद ही श्रेष्ठ श्वेत मुनि को समाप्त आयु वाला जानकर उन्हें ले जाने के लिये महातेजस्वी काल मुनि के पास पहुंचा. मृत्यु को सन्निकट जान कर श्वेत मुनि ने काल को देख कर त्रिनेत्र शिव का स्मरण करते हुए उनकी आराधना करने लगे.

वे ऐसा कहते हुए ध्यानपरायण थे कि जब मैं सुख कर सम्बंध वाले तथा जगत का पोषण करने वाले त्रिनेत्र शिव का भजन कर रहा हूं तो मृत्यु मेरा क्या कर लेगी, क्योंकि में तो काल का भी काल हूं. श्वेत मुनि को देख कर लोकों को भयभीत करने वाला वह काल मुस्कुराकर उनसे बोला – हे श्वेत, अब तुम मेरी ओर आओ, इस पूजा – पाठ आदि से तुम्हें क्या लाभ? हे द्विजवर-भगवान विष्णु, ब्रह्मा अथवा जगदीश्वर रुद्र इनमें भला कौन मेरे द्वारा ग्रास बनाये गये जीव को बचा सकने में समर्थ है. हे विप्र, यह रुद्र पूजा मुझ शक्तिमान का क्या कर सकती है. जिस किसी को भी ले जाने के लिये मैं उठ खड़ा होता हूं, उसे क्षण भर में यमलोक पहुंचा देता हूं. हे मुने, क्योंकि तुम समाप्त आयु वाले हो चुके हो अत: तुम्हें ले जाने हेतु मैं यहां आया हूं. उस काल का वह धर्ममिश्रित भयावह वचन सुनकर मुनिवर श्वेत ‘हा रुद्र, हा रुद्र , हा रुद्र’ कहकर विलाप करने लगे और अश्रुपूरित तथा व्याकुल नेत्रों से एवं कातर दृष्टि से शिवलिंग को निहारते हुए अत्यंत व्याग्रचित्त होकर उस काल से कहने लगे- हे कोल. तुम मेरा क्या बिगाड़ सकते हो, क्योंकि सभी देवताओं को उत्पन्न करने वाले हमारे स्वामी वृषध्वज शंकर रुद्र इस लिंग में विराजमान हैं. विधि का विधान शिवजी के प्रति अतिशय भक्ति रखने वाले मुझ सदृश्य महात्माओं का क्या कर सकता है. अतएव हे महाबाहो, आप जिस प्रकार आये थे, उसी प्रकार चले जाइये.

तदन्तर श्वेतमुनि का वैसा वचन सुनकर हाथ में पाश धारण किये, तीक्ष्ण दाढ़ी वाले भयंकर काल ने कुपित होकर सिंह के सदृश घोर गर्जना करते हुए तथा पाश को बार-बार फटकारते हुए काल-प्राप्त मुनि को बांध दिया और पुन: उनसे कहा – हे विप्रर्षे, तुम श्वेत को यमलोक ले जाने के निमित्त मैंने बांध दिया है, किंतु देवाधिदेव रुद्र ने इस समय तुम्हारी क्या सहायता की. कहां शिव, कहां तुम्हारी भक्ति तथा पूजा, कहां पूजा का फल और कहां मैं तथा मेरा भय. हे श्वेत, अब तुम मेरे द्वारा बांध दिये गये हो. हे श्वेत. तुम्हारा महेश्वर रुद्र जो इस लिंग में स्थित है, वह महादेव तो निश्चेष्ट हो तो फिर तुम उस महेश्वर की पूजा क्यों करते हो. तत्पश्चात मुनि का प्राण हरण के निमित्त आये हुए काल का संहार करने के लिए कामदेव के शत्रु, दक्ष-यज्ञ के विध्वंसक तथा त्रिनेत्र सदाशिव महादेव शंकर अपने नंदी, गणेश्वरों और पार्वती सहित मुस्कुराते हुए शीघ्रतापूर्वक शिवलिंग से साक्षात प्रकट हुए . हे द्विजों, शिवजी को देखते ही उसी क्षण भय के कारण वह बलवान काल श्वेतमुनि के पास शीघ्र ही गिर पड़ा और काल का भी अंत करने वाले शिवजी को देखकर जोर से चिल्लाया. हे उत्तम विप्रों, मृतप्राय उस काल को शिवजी ने अपने कृपावलोकन से जीवन प्रदान कर दिया. सभी महान देवतागण तथा मुनि वृन्द महेश्वर तथा माता पार्वती को प्रणाम करने लगे और हर्षित होकर उच्च स्वर में ह्यजय हो-जय हो . ऐसा बोलने लगे.

नभमण्डल में स्थित देव समुदाय इन श्वेत मुनि तथा शंकरजी के सिर पर आकाश से अत्यंत सुंदर, शीतल तथा सुगन्धित पुष्पों की वर्षा करने लगे. तत्पश्चात शिलाद के पुत्र तथा शिवजी के अनुचर गणेश्वर नन्दीजी काल को मरा हुआ देखकर अत्यंत विस्मित हुए और उन्होंने अविनाशी महेश्वर शिव को प्रणाम कर उनसे कहा कि यह अल्पबुद्धि काल मर चुका है, अब आप इस काल और मुनि-दोनों पर अनुग्रह कीजिए. तत्पश्चात क्षणभर में ही मृत होकर पृथ्वी पर गिरे काल को देखकर उसके द्विज श्रेष्ठ श्वेत-दोनों पर अनुग्रह करके भगवान शंकर तत्काल गुप्त शरीर में समाविष्ट हो गये. अतएव हे भक्तों सभी को मोक्ष तथा भोग प्रदान करने वाले मृत्युंजय महादेव की सदैव भक्ति पूर्वक पूजा करनी चाहिये.

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