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विश्व का प्रारंभिक काल

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इस ब्रह्मांड का स्वामी परम ब्रह्म परमात्मा है, जो निराकार और निगरुण है. वेदांत दर्शनशास्त्रियों के मतानुसार, ब्रह्म ही इस दृश्यमान संसार का निमित्त और उपादान कारण है. वही सर्वव्यापक आत्मा और विश्व की प्राणशक्ति है. शास्त्रसम्मत आध्यात्मिक विषय है कि यह विश्व अपने प्रारंभिक काल में अंध कारावृत था, स्वयंभू भगवान ने अंधकार को हटा कर स्वयं को प्रकट किया.

सबसे पहले उसने जल पैदा किया तथा उसमें बीज वपन किया. यह बीज स्वर्णिम अंडे के रूप में हो गया, जिससे ब्रह्म (सृष्टिकर्ता) के रूप में वह स्वयं उत्पन्न हुआ. ब्रह्म ने इस अंडे के दो खंड किये, जिससे उसने द्युलोक और अंतरिक्ष को जन्म दिया. इस प्रकार से सृष्टि संचरित होने लगी. कालांतर में इस सृष्टि को प्रकृति और प्राकृतिक संपत्ति के नाम से जाना जाने लगा.

संप्रति, सृष्टि अथवा प्रकृति, जिसमें सकल चराचर, जंगम-स्थावर, स्थूल-सूक्ष्म, अणु-विभु एवं नित्यानित्य तत्व निहित हैं, वे सभी इसकी रमणीयता व विराटता के साधक कारक हैं. परमात्मा अपनी इसी संरचना से इस सृष्टि के कण-कण में समाहित रहता हुआ स्वयं दर्शक बन जाता है और संसार को रंगमंच एवं सांसारिक प्राणियों को अभिनेता-अभिनेत्री के रूप में देखता रहता है. ऐसे में प्रकृति में परिव्याप्त प्राण-ऊर्जा, जो निरंतर प्रवाहित होती रहती है, उसे चतुर प्राणी प्राप्त करके अपनी भूमिका को प्रशंसनीय बनाता है.

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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