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मात्र-भेद से विष-अमृत

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रोगों का एक निमित्त कारण भोजन भी है. भोजन के विषय में भी हमारा अज्ञान है. वह मिटता है तो बहुत सारे रोग उत्पन्न ही नहीं होते और जो उत्पन्न हो चुके हैं, वे भी धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं. भोजन से दुख कम होता है, तो दुख बढ़ता भी है. जितने पोषक द्रव्य है, उनमें पोषक तत्वों के साथ-साथ अपोषक तत्व भी है.

आयुर्वेद के आचार्यो ने बहुत स्पष्टता से लिखा है कि विश्व में ऐसा एक भी पदार्थ नहीं है, जो केवल अमृत या केवल विष हो. सर्वथा निदरेष या सदोष पदार्थ एक भी नहीं है. सब कुछ मात्र-भेद से होता है. मात्र से ही पदार्थ निदरेष होता है और मात्र से ही पदार्थ सदोष होता है. मात्र के भेद से संखिया भी अमृत है और अमृत भी संखिया है, विष है. सब कुछ मात्र-भेद से होता है. कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं है, जिसे अमृत कहा जा सके या विष कहा जा सके. अमृत के साथ विष और विष के साथ अमृत जुड़ा हुआ है. रोग-निवारण के लिए दवाइयां ली जाती हैं. क्या इनके साथ शरीर में जहर नहीं जाता? बहुत जहर जाता है. दवाई से लाभ है, तो हानि भी है.

अंगरेजी दवाई का सेवन करनेवाले इसे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं. लाभ और हानिदोनों साथ-साथ चलते हैं. अमृत और विष- दोनों साथ-साथ चलते हैं. मात्र-भेद से हम किसी को लाभकारक मान लेते हैं और किसी को हानिकारक मान लेते हैं. किसी को हम सुखद मान लेते हैं और किसी को दुखद मान लेते हैं. इस तरह से हम इस भौतिक संसार में सुख के नाम पर, प्रियता के नाम पर, सारे दुख झेल रहे हैं.

आचार्य महाप्रज्ञ

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