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अविनाशी प्रकृति ही ईश्वर

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जब हम यह कहते हैं कि प्रकृति की लीला है कि कहीं धूप कहीं छांव है, तब निश्चित रूप से हम प्रकृति का ईश्वर के अर्थ में प्रयोग करते हैं. जब हम पहाड़ों, झरनों, फूलों, उषा की लाली आदि को देख कर कहते हैं, अहा! कितनी सुंदर प्रकृति है.
तब प्रकृति शब्द का अर्थ उन वस्तुओं या दृश्यों से होता है, जो स्वत: हैं, नैसर्गिक हैं, कृत्रिम या मानव निर्मित नहीं. जब हम यह कहते हैं कि बिच्छू की प्रकृति है डंक मारना और मनुष्य की प्रकृति है क्षमा करना, तब हम प्रकृति शब्द का प्रयोग जीवों के ऐसे स्वभाव के लिए करते हैं, जो उसे प्राणी विशेष होने के कारण प्राप्त है या उसका जन्मजात गुण है, न कि अजिर्त चरित्र है. प्रकृति के ये तीन अर्थ ऊपर से भिन्न दिखते हैं, किंतु वे सब एक ही अर्थ देते हैं.
वस्तुत: प्रकृति उस अविनाशी को ही कहते हैं जो स्वयं है, वह ईश्वर स्वयं है. ईश्वर ही जिन रूपों में जगत् में दृश्यमान है, हमारे सामने प्रकट है-वह प्रकृति या प्राकृतिक रूप और दृश्य आदि ईश्वर या प्रकृति ही तो है. उसी तरह जीवों में जो भाव स्वत: उत्पन्न है, उसे उसकी प्रकृति कहते हैं अर्थात् वहां भी प्रकृति रूपी ईश्वर विद्यमान है. इस प्रकार जो स्वयं है, वही प्रकृति है.
अब प्रकृति शब्द के निर्माण की बात करते हैं. प्रकृति शब्द में कृति में ‘प्र’ उपसर्ग लगा हुआ है. कृति का अर्थ है-रचना तथा प्र का अर्थ है-जो पहले से विद्यमान है अर्थात् जो रचा नहीं गया है. इस प्रकार प्रकृति को समझने के लिए उसके व्यापक अर्थ को नजर में रखना होगा, तभी अंत: या बाह्य, दृश्यमान या अदृश्य प्रकृति को समझ सकते हैं.
आचार्य सुदर्शन
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