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चांद्र मास व सूर्य के संचरण से बनता है सौर मास

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चांद्र मास व सूर्य के संचरण से बनता है सौर मास

मार्कण्डेय शारदेय, ज्योतिषाचार्य

खगोल स्वयं में विज्ञान है. आकाश में टिमटिमाते तारों की बाह्य -अंत: प्रवृत्तियों का बिना वैज्ञानिक यंत्रों का अध्ययन कर हमारे पूर्वजों ने बहुत पहले अनेक खगोलीय रहस्यों का उद्घाटन कर दिया था, जिसे हम ज्योतिष विद्या के नाम से जानते हैं.

अनगिनत नक्षत्रों में से कुछ समूहों को विशेष नाम देकर अपनी विद्या और लोक कल्याण में उनको जोड़ा. ऐसे ही नक्षत्र-समूहों में हैं- अश्विनी, भरणी आदि 27 (अभिजित को लेकर 28) नक्षत्र हैं. ज्योतिष के ये मुख्य आधार हैं. सबसे बड़ी बात कि हमारे महीनों के नाम के भी ये ही आधार हैं. चंद्रमा का इन पर संचरण से चांद्र मास और सूर्य के संचरण से सौर मास बनता है. हमारे चैत्र आदि महीनों के नाम चित्रा आदि नक्षत्रों के नाम पर ही पड़ा है. प्रायः चंद्रमा कृष्ण प्रतिपदा से शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि अर्थात् पूर्णिमा को उसी नक्षत्र पर आ जाता है, जिसके नाम पर वह महीना बना है.

नारद जी का भी कथन है –

यस्मिन् मासे पौर्णमासी येन धिष्ण्येन संयुता।

तन्नक्षत्राह्वयो मासः पौर्णमासःतथाह्वयः।।

अर्थात पूर्णिमांत मास जिस नक्षत्र से युक्त होता है, यानी पूर्णिमा को जो नक्षत्र रहता है, उसी नाम पर उस महीने का नाम पड़ता है.

सूर्य सिद्धांत का भी कथन है –

कार्तिकादिषु मासेषु कृत्तिकादि द्वयं द्वयम्।

अन्त्योपान्त्यौ पंचमश्च त्रभमासत्रयं स्मृतम्।।

अर्थात् कार्तिक आदि में कभी-कभी कृत्तिका आदि का व्यवधान भी होता है, यानी निर्धारित नक्षत्र नहीं भी जैसे- कार्तिक पूर्णिमा को कृत्तिका के बदले रोहिणी होने पर भी कार्तिक; आश्विन पूर्णिमा को अश्विनी के बदले रेवती या भरणी, भद्रपद पूर्णिमा को शतभिषा, पूर्वा भद्रपद या उत्तरा भाद्रपद होने पर भी भादो एवं फाल्गुन पूर्णिमा को मघा, पूर्वा फाल्गुनी या उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र होने पर भी फागुन ही होता है.

इसी तरह बृहस्पति कहते हैं –

नक्षत्र-द्वितयेष्विन्दौ पूर्णे त्वाष्ट्रद्वये ततः।

मासश्चैत्रादयः षड्भिःषट्सप्तान्त्यत्रिभिर्दिनैः।।

आशय यह कि चैत्र पूर्णिमा को चित्रा या स्वाती नक्षत्र हो सकता है, यानी दो-दो नक्षत्रों का अंतर हो सकता है, परंतु छठे, सातवें और बारहवें महीने में तीन-तीन नक्षत्रों का भी अंतर संभव है.

सहज रूप से हम ऐसे समझें कि चांद्र मास दो पक्षों (शुक्ल 15 + कृष्ण 15=30 अमांत तथा कृष्ण 15+शुक्ल 15=30 पूर्णिमांत) का होता है. सबसे पहले जानें कि जिस पूर्णिमांत मास की पूर्णिमा को अश्विनी नक्षत्र हो, तो वह आश्विन मास होता है.

प्राचीन काल में इन चांद्र मासों का प्रारंभ कार्तिक से होता था, इसलिए सूर्य सिद्धांत कार्तिकादि कहता है और आश्विन को अंत्य तथा भादो को उपांत्य. बाद में सौर और चांद्र को साथ लाने के लिए चैत्रादि क्रम चला. ग्रहों एवं प्रकृति के आधार पर चैत-वैशाख का राहु, जेठ का मंगल, आषाढ का सूर्य, सावन का शुक्र, भादो का चंद्रमा, आश्विन-कार्तिक का बुध, अगहन-पूस का गुरु तथा माघ-फागुन का स्वामी शनि बताये गये हैं.

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