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शारदीय नवरात्र छठा दिन : ऐसे करें मां कात्यायनी की पूजा

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शारदीय नवरात्र छठा दिन : ऐसे करें मां कात्यायनी की पूजा
जिनका हाथ उज्ज्वल चंद्रहास (तलवार) से सुशोभित होता है तथा सिंहप्रवर जिनका वाहन है, वे दानव संहारिणी दुर्गा देवी कात्यायनी मंगल प्रदान करें.
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका
भगवती के दर्शन के लिए उत्सुक ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर जब विमान से उतर कर उनके समीप गये, तब तीनों उसी क्षण स्त्री रूप हो गये. वहां के अद्भुत दृश्य का नारद से वर्णन करते हुए ब्रह्मा जी ने बताया कि- नारद, अतीव अद्भुत दृश्य था. हमलोगों ( स्त्री रूप में-त्रिदेवों) ने श्री भुवनेश्वरी देवी के नख-दर्पण में अखिल ब्रह्मांड को देखा –
वैकुण्ठो ब्रह्मलोकश्च कैलाश: पर्वतोत्तमः ।
सर्वे तदखिलं दृष्टं नखमध्यस्थितंचन ।।
त्रिदेवों ने देवी को स्तवों से प्रसन्न कर दिया. सुप्रसन्न देवी ने शिवजी को नवाक्षर मंत्र प्रदान किया तथा ब्रह्मा को उपदेश दिया –
सदैकत्वं न भेदोअस्ति सर्वदैव ममास्य च ।
योअसौ साहमहं याअसौ भेदोअस्ति मतिविभ्रमात् ।।
सर्व मगलमयी मां ने ब्रह्मा जी को मधुर वाणी में कहा- एक मात्र सद् ही ब्रह्म हैं, उनमें और मुझ में भेद नहीं है. जो वह हैं वही मैं हूं, किंतु लोग मति के भ्रम से ही मुझ में और उनमें भेद समझते हैं. एकमात्र ब्रह्म ही अद्वितीय हैं. वही नित्य और सनातन है, परंतु जब यह विश्व की रचना में तत्पर होता है, वह अनेक रूप हो जाता है.
भुवनेश्वरीदेवी ने वहीं ब्रह्मा को महासरस्वती, विष्णुको महालक्ष्मी तथा शिव को महाकाली (गौरी) देवियों को देकर ब्रह्मलोक, विष्णुलोक तथा कैलाश जाकर अपने-अपने कार्यों के पालन का निर्देश देकर भेज दिया.
स्थलांतरं समासाद्द ते जाताः पुरुषा वयम् ।
दूसरे स्थानों पर जाने पर पुनः त्रिदेव पुरुषरूप में हो गये. इस प्रकार आद्दाशक्ति की तथा तीन महाशक्तियों की उपासना का प्रवर्तन हो गया और पंचविध संप्रदाय विशेष गौरवास्पद माना गया.
(क्रमशः) प्रस्तुति डॉ एनके बेरा
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