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जानें किस तिथि को करें श्राद्ध

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जानें किस तिथि को करें श्राद्ध
सभी के लिए मान्य है सर्वपितृ श्राद्ध
मार्कण्डेय शारदेय, ज्योतिष व धर्मशास्त्र विशेषज्ञ
तर्पण मुख्यतः जल का अर्पण है. स्नान के बाद जलाशय में खड़े होकर ही भींगे कपड़े में या अन्यत्र आसन पर बैठकर सूखे कपड़े में देय जल में अक्षत, पुष्प, चंदन डालकर आदिस्रष्टा ब्रह्माजी से लेकर ब्रह्मांड तक के समस्त प्राणियों का आवाहन किया जाता है.
इसके बाद अंजलि में अक्षत-कुश लेकर अग्रभाग से एक-एक बार ब्रह्मा आदि देवों, मरीचि आदि ऋषियों को अर्पित किया जाता है. दूसरे चरण में जौ-कुश लेकर दो-दो बार सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार एवं नारद इन दिव्य आदि मनुष्यों को जलार्पण का विधान है. इसमें अंजलि के मध्यभाग से, अर्थात् कनिष्ठा अंगुली की जड़भाग खोल कर वहां से (ऋषितीर्थ से) विहित है.
तीसरा चरण पितरों से संबंधित है, जिसमें दक्षिणमुख हो पितरों का ध्यान-आवाहन किया जाता है. इसके तहत अंजलि में काला तिल-कुश लेकर पितृतीर्थ से, यानी अंगूठे और तर्जनी के बीच से (गांसे से) एक-एक के नाम से तीन-तीन बार जल अर्पित किया जाता है. चूंकि हमारा मन इनसे बंधा रहता है, इसलिए इनमें जो अब धरती पर न हों, उन्हें तिल-मिश्रित जल एक-एक बार देने का विधान है.
पुराण के अनुसार पितृ पक्ष में पितरों के नाम से तर्पण करते हुए हर दिन पितरों को जल देना चाहिए. जिस तिथि को पिता की मृत्यु हुई हो, उस दिन पितरों के नाम से श्राद्ध करना चाहिए. जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, उनका श्राद्ध अमावस्या तिथि (27 सितंबर) को करना चाहिए. श्राद्ध पक्ष में अमावस्या के दिन सर्वपितृ श्राद्ध किया जाता. पूरे पितृपक्ष में किसी ने अगर पितर का श्राद्ध न किया हो, तो इस दिन कर सकता है. यह तिथि 28 सितंबर को है.
आवाहन विधि : हाथों में कुश लेकर दोनों हाथों को जोड़कर पितरों का ध्यान करें एवं उन्हें आमंत्रित करें-
ओम आगच्छन्तु पितर एवं ग्रहन्तु जलान्जलिम। यानी हे पितरों, पधारिए और जलांजलि ग्रहण कीजिए. पिता को तीन बार दूध, तिल और जौ से जलांजलि दें, जबकि माता को पूर्व दिशा में 16 बार, उत्तर में 7 और दक्षिण में 14 बार जलांजलि देना चाहिए, क्योंकि मातृ ऋण सबसे बड़ा है.
श्राद्ध की तिथियां
13 सितंबर- पूर्णिमा श्राद्ध , 14 सितंबर- प्रतिपदा, 15 सितंबर- द्वितीया, 16 सितंबर- तृतीया, 17 सितंबर- चतुर्थी, 18 सितंबर- पंचमी, महा भरणी, 19 सितंबर- षष्ठी, 20 सितंबर- सप्तमी, 21 सितंबर- अष्टमी, 22 सितंबर- नवमी, 23 सितंबर- दशमी, 24 सितंबर- एकादशी, 25 सितंबर- द्वादशी, 26 सितंबर- त्रयोदशी, 27 सितंबर- चतुर्दशी, 28 सितंबर- सर्वपित्र अमावस्या.
किस तिथि को करें श्राद्ध
दिवंगत परिजन की मृत्यु की तिथि में ही श्राद्ध किया जाता है. यानी अगर परिजन की मृत्यु प्रतिपदा के दिन हुई है, तो प्रतिपदा के दिन ही श्राद्ध करना चाहिए.
अकाल मृत्यु, दुर्घटना को प्राप्त दिवंगत व्यक्ति का श्राद्ध चतुर्दशी के दिन श्राद्ध का विधान है.
दिवंगत पिता का श्राद्ध अष्टमी और मां का श्राद्ध नवमी को.
जिन पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, उन्हें अमावस्या को.
अगर कोई सुहागिन स्त्री मृत्यु को प्राप्त हुई हो, तो उसका श्राद्ध नवमी को करना चाहिए.
संन्यासी का श्राद्ध द्वादशी को किया जाता है.
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