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शिव अरूप, पर बहुरूपों में विख्यात

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शिव अरूप, पर बहुरूपों में विख्यात
नटराज, मृत्युंजय, त्रिमूर्ति, बटुक-शिवलिंग, हरिहर, अर्द्धनारीश्वर, कृतिवासा, पंचवक्त्र, पितामह, महेश्वर सर्वज्ञ इत्यादि शिव के प्रतिरूप हैं. शिव की लीलाओं की तरह इनकी महिमा भी अपरंपार है. इसी कारण नाम भी निराले हैं. शैवागम के अनुसार, इनका एक प्रमुख रूप ‘रुद्र’ हैं. पुन: रुद्र के ग्यारह रूप हैं- शंभु, पिनाकी, गिरीश, स्थाणु, भर्ग, सदाशिव, शिव,हर, शर्व, कपाली और भव, जिनके अपने माहात्म्य हैं.
1. शंभु : शिव सभी को उत्पन्न करने के कारण शंभु कहे गये हैं. प्रथम रुद्र शंभु हुए.
2. पिनाकी : रुद्र के दूसरे रूप में शिव पिनाकी कहे गये हैं. उनके रुद्र स्वरूप ही ‘वेद’ हैं.
3. गिरीश : कैलाश पर्वत पर भगवान रुद्र अपने तीसरे रूप में हैं. इसी कारण ‘गिरीश’ नाम से प्रसिद्ध हैं.
4. स्थाणु : रुद्र के चौथे स्वरूप को ही स्थाणु कहा गया है. इस अवस्था में शिव समाधिमग्न तथा निष्काम भाव में हैं.
5. भर्ग : पांचवें स्वरूप में रुद्र ‘भर्ग’ कहे गये हैं. इस रूप में वे भय विनाशक हैं. अत: इसी कारण भर्ग कहलाये हैं.
6. सदाशिव : रुद्र के छठे स्वरूप को ‘सदाशिव’ कहा गया है. मूर्तिरहित परब्रह्म रुद्र हैं. अत: चिन्मय आकार के कारण सदाशिव हैं.
7. शिव : रुद्र के सातवें स्वरूप को ही ‘शिव’ कहा गया है, जिनको सभी चाहते हैं, उन्हीं को ‘शिव’ मानते हैं. इन रूप में इनका भवन- ऊंकार हैं.
8. हर : रुद्र का आठं स्वरूप ही ‘हर’ है. इस रूप में ये भुजंग भूषणधारित हैं और सर्प संहारक तमोगुणी प्रवृत्त हैं. इस कारण भगवान हर कालातीत हैं.
9. शर्व : रुद्र के नौवें स्वरूप को ‘शर्व’ कहा गया है. सर्वदेवमय रथ पर आरुढ़ होकर त्रिपुर संहार के कारण ही इन्हें शर्व-रुद्रं कहा गया.
10. कपाली : रुद्र के दसवें स्वरूप का नाम कपाली हैं. ब्रह्मा के मस्तक विच्छेन और अतिशय क्रोधित मुख युक्त होकर ही दक्ष-यज्ञ विध्वंस करने के कारण ही इस रूप में इनका नाम ‘कपाली’ है.
11. भव: रुद्र के ग्यारवें स्वरूप को ‘भव’ कहा गया है. वेदांत का प्रादुर्भाव इसी रूप में हुआ. योगाचार्य के रूप में वे योगमार्ग खोलते हैं. संपूर्ण सृष्टि में इसी स्वरूप से व्याप्त हैं.
बाबा मंिदर में खास
ठोस पत्थरों से निर्मित है बाबा बैद्यनाथ का मंदिर.
शिव मंिदर की ऊंचाई 72 फीट है और इसके शीर्ष पर पंचशूल है.
मंिदर प्रांगण में अन्य 22 मंदिर हैं.
महादेव आह्वान महामंत्र स्तुति
‘कैलासशिखरस्यं च पार्वतीपतिमुर्त्तममि।
यथोक्तरूपिणं शंभुं निर्गुणं गुणरूपिणम्।।
पंचवक्त्र दशभुजं त्रिनेत्रं वृषभध्वजम्।
कर्पूरगौरं दिव्यांग चंद्रमौलि कपर्दिनम्।।
व्याघ्रचर्मोत्तरीयं च गजचर्माम्बरं शुभम्।
वासुक्यादिपरीतांग पिनाकाद्यायुद्यान्वितम्।।
सिद्धयोऽष्टौ च यस्याग्रे नृत्यन्तीहं निरंतरम्।
जयज्योति शब्दैश्च सेवितं भक्तपुंजकै:।।
तेजसादुस्सहेनैव दुर्लक्ष्यं देव सेवितम्।
शरण्यं सर्वसत्वानां प्रसन्न मुखपंकजम्।।
वेदै: शास्त्रैर्ययथागीतं विष्णुब्रह्मनुतं सदा।
भक्तवत्सलमानंदं शिवमावाह्याम्यहम्।।
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