मार्कण्डेय शारदेय, ज्योतिषाचार्य
ज्योतिष में राहु और केतु छाया ग्रह (तमः स्वरूपौ शिखि-सिंहिकासुतौ) हैं, इसलिए प्रेतत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं. राहु को दादा ग्रह तथा केतु को नाना ग्रह मानने का आशय भी पितृकुल एवं मातृकुल के पूर्वजों से ही है. शनिपुत्र गुलिक भी ऐसा ही कार्य करता है, इसलिए चाहे प्रेतबाधा हो, ग्रहण योग हो व पितृदोष; सबका मुखिया राहु है. नवम भाव में बैठा राहु खास कर मकर का हो और यदि सूर्य या चंद्र के साथ हो, पुनः छह अंश से कम दूरी हो, तो विशेष तबाही मचा सकता है. दृष्टि संयोग भी अंशतः अशुभ ही होता है. इसके अतिरिक्त कुंडली के अष्टम भाव में शनि के साथ निर्बल चंद्र (रन्ध्रे समन्देsबले पिशाच-पीडा) अथवा शनियुत राहु का लग्न में होना (तमोsर्कजो लग्ने पिशाचपीडा) प्रेतबाधा का परिचायक है. दूसरी ओर सप्तम भाव में मंगल या शनि के साथ राहु या केतु की युति हो, तो पति या पत्नी का प्रेत-ग्रसित होना संभव है.
