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वास्तविकता के साथ जीने की कला सीखना ही है जीवन का सत्य

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वास्तविकता के साथ जीने की कला सीखना ही है जीवन का सत्य

सद्‌गुरु जग्गी वासुदेव

(आध्यात्मिक गुरु व संस्थापक-इशा फाउंडेशन)
आ ध्यात्मिक मार्ग पर यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आप किसी विशेष जगह पहुंचने का प्रयत्न न करें, क्योंकि जैसे ही आप कुछ विशेष पाना चाहेंगे, आपका मन ‘वह विशेष स्थान’ बनाने लगेगा. आप अपना खुद का निजी स्वर्ग ही बना लेंगे.
आध्यात्मिक प्रक्रिया का अर्थ यह नहीं है कि आप वहम, मतिभ्रम के एक स्तर से निकल कर दूसरे स्तर पर पहुंच जायें. यह इसलिए है कि आप अपने सारे वहम, सारे मतिभ्रम बिल्कुल ही छोड़ दें, पूर्ण रूप से त्याग दें और वास्तविकता को उसी रूप में स्वीकार करें, जैसी वे हैं, क्योंकि ये सारे प्रयत्न सत्य के बारे में हैं.
सत्य का अर्थ है, जो अस्तित्व में है, न कि वह जो आप अपने मन में बना लेते हैं. हम अपने मन में भगवान या शैतान देख सकते हैं- दोनों का ही महत्व नहीं है. आप जो कुछ देखते हैं, वह आपकी संस्कृति पर निर्भर करता है और उन चीजों पर भी जिनका अनुभव आपको हुआ है. जब आप लोगों को देखते हैं, तो उनमें भगवान को देखते हैं या शैतान को- ये इस पर निर्भर करता है कि आप आशावादी हैं या निराशावादी.
इसका संबंध वास्तविकता से नहीं होता. वास्तविकता तो यह है कि अभी आप यहां हैं और आपको यह भी नहीं पता कि आप किस कारण से यहां हैं, कहां से आये हैं और कहां जायेंगे? यही जीवन की वास्तविकता है.
कुछ धर्मों ने हमेशा आशा बांटी है, लेकिन वास्तव में किसी मनुष्य के लिए अगर सबसे खराब कुछ हो सकता है, तो वह है आशा, क्योंकि आशा का अर्थ है कि आप भविष्य की कल्पनाओं में खो जायेंगे, ‘अभी हालत खराब है, लेकिन कोई बात नहीं, मैं अच्छा आदमी हूं, लेकिन गरीब हूं तो क्या, जब मैं स्वर्ग में जाऊंगा तब भगवान की गोद में बैठूंगा’.
यही आशा है. आपको बस अपने आप को ऐसे बनाना है कि आप कोई कल्पना न करें, अच्छी या बुरी. आप कोई भगवान या शैतान न बनाएं, स्वर्ग और नर्क, अच्छा और खराब न बनाएं.
जैसे ही कोई आपको आशा की झलक देगा, आप कल्पनाएं करने लगेंगे. आशा, झूठ का पुलिंदा बनाने का तरीका है. अगर आप आनंदमय रूप से आशा रहित होंगे, तो बात बन जायेगी. आप ऐसी जगह पहुंच पाएं, जहां आप को किसी आशा की जरूरत न हो. फिर जो भी हो, आप ठीक रहेंगे, क्योंकि आपने अपने अंदर ही कुछ पा लिया है.
वास्तविकता के साथ जीना सीखना सबसे महत्वपूर्ण बात है. आप को कुछ और नहीं करना है. अगर आप अपने मन में चीज़ों को तोड़ना, मरोड़ना, बिगाड़ना बंद कर दें और हरेक चीज को वैसी ही देखें, जैसी वह है, तो मुक्ति आपसे बस एक कदम ही दूर है. आप को कुछ भी नहीं करना है, समय ही सब कर लेगा. समय आप को किसी और तरह से परिपक्व कर देगा.
अगर आप चीजों को वैसे ही देखते हैं जैसी वे हैं, तो आप देखेंगे कि जीवन केवल इस या उस रूप में नहीं होता. ये पूरे ब्रह्मांड में हर तरफ विस्फोटित हो रहा है. यह एक जीवित ब्रह्मांड है. इस बात को आप तभी देख सकेंगे जब आप हर किसी की पहचान इस तरह से करना बंद कर दें, ‘यह जीवन है, यह जीवन नहीं है, इसमें प्राण हैं, इसमें प्राण नहीं हैं, यह पुरुष है, यह स्त्री है’.
हर चीज को बस वैसी ही देखिए, जैसी वह है, तो ‘यही सब कुछ है’ जैसा कुछ भी नहीं होता. यह तल्लीन हो जाने की अंतहीन प्रक्रिया है. मान लें कि एक ऐसी स्थिति हो जब आप कहें, ‘यही सब कुछ है’, तो फिर उसके बाद आप क्या करेंगे?
जब आप ब्रह्मांडीय जीवन जीने लगते हैं, तो जीवन अलग हो जाता है. क्या ये सुंदर होता है? नहीं! क्या ये गंदा होता है? नहीं! तो फिर ये कैसा है? जीवन की तरह, जैसे इसे होना चाहिए, इस तरह या उस तरह नहीं. हर चीज वैसी ही है, जैसी उसे होना चाहिए.
यह बस आप का मन है, जो हर चीज़ को तोड़-मरोड़ कर दिखाता है. जब आप तोड़ना-मरोड़ना बंद कर देते हैं और हर चीज को वैसी ही देखते हैं जैसी वह है, तो आप जीवन का विस्फोट देखेंगे. यदि आप यहां एक करोड़ वर्ष भी रहें, तो भी यह आपको इसे समझने में जबरदस्त रूप से व्यस्त रखेगा.
आप कोई कल्पना न करें…
आपको बस अपने आप को ऐसे बनाना है कि आप कोई कल्पनाएं न करें, अच्छी या बुरी. आप कोई भगवान या शैतान न बनाएं, स्वर्ग और नर्क, अच्छा और खराब न बनाएं. ऐसा कुछ भी न हो कि, ‘मैं इस व्यक्ति को पसंद करता हूं, उसे नहीं करता’. आप हर चीज को उसी तरह से देखना सीख लें, जैसी वे हैं, बस यही सब कुछ है. किसी खास समय पर, कुछ विशेष गतिविधि के लिए, हमें चीजों को एक विशेष रूप में देखना पड़ सकता है. बाकी समय आप उन्हें बस वैसी ही देखिए, जैसी वे हैं.
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