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अन्‍न-जल त्यागकर पति की लंबी उम्र के लिए सुहागिनें रखती हैं करवा चौथ का व्रत

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अन्‍न-जल त्यागकर पति की लंबी उम्र के लिए सुहागिनें रखती हैं करवा चौथ का व्रत

संजय सागर

सुहागिनों का त्यौहार करवा चौथ की लोकप्रियता अब पूरे भारत में धीरे -धीरे बढ़ रही है. पहले यह त्यौहार शहरों में महिलाएं मनाया करती थी. लेकिन अब गांवों और कस्बों में भी यह त्यौहार मनाया जाने लगा है. इसलिए करवा चौथ महिलाओं का मुख्य त्‍यौहार बन गया है. यह व्रत सुहागन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए करती है. करवा चौथ का व्रत कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को सुहागन स्त्रियों द्वारा किया जाता है.

यह व्रत हर विवाहित महिला अपने रिवाजों के अनुसार रखती है और अपने जीवन साथी की अच्छी सेहत तथा अच्छी उम्र की प्रार्थना भगवान से करती है. आज कल यह व्रत कुवारी लड़किया भी अच्छे पति की प्राप्ति के लिए रखती हैं.

करवा चौथ का महुर्त

इस वर्ष करवा चौथ का व्रत 27 अक्टूबर 2018, शनिवार के दिन है. इस दिन पूजन का महुर्त 17:48 से 19:04 तक कुल 1 घंटा 16 मिनट का है.

ऐसे किया जाता है करवा चौथ व्रत

परंपराओं के अनुसार करवा चौथ व्रत की पूजा को करते समय एक पत्ते पर जल से भरा लोटा एवं एक करवे में गेहूं भरकर रखते हैं. इस दिन पूजन के लिए दीवार पर या कागज पर चंद्रमा तथा उसके नीचे भगवान शिव और कार्तिकेय की तसवीर बनायी जाती है. और इसी प्रतिमा की पूजा स्त्रियों द्वारा की जाती है. इस दिन महिलाएं सारा दिन व्रत रखती है, वे जल और फल भी ग्रहण नहीं करती.

दिन भर की कठोर तपस्या के बाद जब रात मे चंद्रमा के दर्शन होते है, तब चंद्रमा की पूजा के बाद यह व्रत पूर्ण होता है. करवा चौथ व्रत में रात की पूजा मे चंद्रमा को अर्घ्य देना महत्वपूर्ण है. हर वो स्त्री जो व्रत करती है वो चंद्रमा को अर्द्ध जरूर देती है और फिर व्रत पूर्ण होता है. अब अपने व्रत को पूर्ण कर स्त्रियां रात में जल तथा भोजन ग्रहण करती हैं.

जब कोई स्त्री एक बार इस व्रत को करना प्रारंभ कर देती है, तो उसे यह व्रत जीवन पर्यंत करना पड़ता है. इसलिए यह जरूरी नहीं है कि हर उम्र में निर्जला रहकर ही यह व्रत किया जाए. एक बार जब सुहागन महिला इस व्रत का उजन कर देती है, तो वह अपनी सुविधा अनुसार व्रत के समय फल, जल और अन्य चीजें ग्रहण कर सकती हैं.

क्या है करवा चौथ की कहानी

एक नगर मे एक साहूकार रहता था. उसके सात लड़के और एक लड़की थी. कार्तिक महीने में जब कृष्ण पक्ष की चतुर्थी आयी, तो साहूकार के परिवार की महिलाओं ने भी करवा चौथ व्रत रखा. जब रात के समय साहूकार के बेटे भोजन ग्रहण करने बैठे, तो उन्होने साहूकार की बेटी (अपनी बहन) को भी साथ में भोजन करने के लिए कहा.

भाइयों के द्वारा भोजन करने का कहने पर उनकी बहन ने उत्तर दिया कि आज मेरा व्रत है. मै चांद के निकलने पर पूजा विधि संपन्‍न करके ही भोजन करूंगी. भाइयो के द्वारा बहन की भूख के कारण मुर्झाया चेहरा देखा नहीं गया. उन्‍होंने अपनी बहन को भोजन कराने के लिए काफी प्रयत्न किया. उन्‍होंने घर के बाहर जाकर अग्नि जला दी.

उस अग्नि का प्रकाश अपनी बहन को दिखाते हुए कहा की देखो बहन चांद निकाल आया है. तुम चांद को अर्ध्य देकर और अपनी पूजा करके भोजन ग्रहण कर लो. अपने भाइयो द्वारा चांद निकलने की बात सुनकर बहन ने अपनी भाभियों के पास जाकर कहा कि भाभी चांद निकल आया है चलो पूजा कर लें. परंतु उसकी भाभी अपने पतियों द्वारा की गयी युक्ति को जानती थी.

उन्होने अपनी ननद को भी इस बारे में बताया और कहा की आप भी इनकी बात पर विश्वास ना करें. परंतु बहन ने भाभियों की बात पर ध्यान ना देते हुए पूजन संपन्न कर भोजन ग्रहण कर लिया. इस प्रकार उसका व्रत टूट गया और गणेश जी उससे नाराज हो गये. इसके तुरंत बाद उसका पति बीमार हो गया और घर का सारा रुपया पैसा और धन उसकी बीमारी में खर्च हो गया.

अब जब साहूकार की बेटी को अपने द्वारा किये गये गलत व्रत का पता चला, तो उसे बहुत दुख हुआ. उसने अपनी गलती पर पश्चाताप किया. अब उसने पुनः पूरे विधि विधान से व्रत और पूजन किया तथा गणेश जी की आराधना की.

इस बार उसके व्रत तथा श्रध्दा भक्ति को देखते हुये भगवान गणेश उस पर प्रसन्न हो गये. उसके पति को जीवन दान दिया और उसके परिवार को धन तथा संपत्ति प्रदान की. इस प्रकार जो भी श्रध्दा भक्ति से इस करवा चौथ के व्रत को करता है, वो सारे सांसारिक क्लेशों से मुक्त होकर प्रसन्नता पूर्वक अपना जीवन यापन करता है.

करवा चौथ व्रत उद्यापन ऐसे करें

जब किसी महिला को करवा चौथ व्रत को करते हुये काफी समय हो जाता है, तो वह अपनी इच्छा अनुसार अपने व्रत का उद्यापन कर सकती है. करवा चौथ व्रत की उद्यापन विधि के लिए महिलाएं अपने घर में पूड़ी तथा हलवा बनाती हैं. अब इन पुड़ियों को एक थाली मे चार-चार के ढेर में तेरह जगह रखते हैं.

अब इन पुड़ियो के उपर थोड़ा-थोड़ा हलवा रखते हैं. अब इसके उपर साड़ी ब्लाउज, अपनी इच्छा अनुसार रुपये रखकर तथा उसके आसपास कुमकुम चावल लगाते हैं. अब इसे अपनी सासु मां के चरण स्पर्श कराकर उन्‍हें देते हैं. अब इन सब के बाद तेरह ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं और उनका पूजन करके तथा दक्षिणा देकर विदा करते हैं.

कुछ स्त्रियां इस दिन उद्यापन के लिए अन्य सुहागन स्त्रियों को भोजन भी कराती हैं. इसके लिए जो भी स्त्रियां करवा चौथ का व्रत करती हैं, उन्हे उद्यापन की सुपारी उद्यापन करने वाली महिला द्वारा पहले ही दे दी जाती है. करवा चौथ व्रत वाले दिन सारी महिलाएं अपनी पूजा कर उद्यापन वाली महिला के घर जाकर अपना भोजन करती है. भोजन के बाद इन सभी महिलाओं को बिंदी लगाकर और सुहाग की सामग्री देकर विदा किया जाता है. इस प्रकार करवा चौथ व्रत की उद्यापन विधि संपन्न होती है.

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