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महालया विशेष : जो दुर्गति का नाश करती हैं, वही जगत जननी दुर्गा कहलाती हैं

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महालया विशेष : जो दुर्गति का नाश करती हैं, वही जगत जननी दुर्गा कहलाती हैं

डॉ एनके बेरा

-पितृ पक्ष की समाप्ति और मांयेर आगमनी

इस वर्ष आठ अक्तूबर (सोमवार) को सुबह 10.47 के बाद अमावस्या लग जायेगी, जो नौ अक्तूबर सुबह 9.10 तक रहेगी. अतः सर्व पैतृअमावस्या का श्राद्ध मध्याह्न काल में अमावस्या मिलने के कारण सोमवार को महालया और पितृ विसर्जन कर दिया जायेगा. जिन पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो उन सबका श्राद्ध आठ अक्तूबर को होगा. आज के दिन ब्राह्मण भोजन कराने से परिवार में सुख-शांति और वंश वृद्धि होती है. नौ अक्तूबर को स्नान-दान और तर्पण योग्य भौमवती अमावस्या का पर्व योग बन रहा है. इसमें गंगा स्नान का फल करोड़ों सूर्यग्रहण स्नान के बराबर माना जाता है. महालया जो पितृ पक्ष का अंतिम दिन, जो लोग पितृ पक्ष के 14 दिनों तक श्राद्ध तर्पण आदि नहीं कर पाते हैं, वे महालया के दिन ही पिंडदान करते हैं. महालया शब्द का आक्षरिक अर्थ है : आनंदनिकेतन. प्राचीन काल से मान्यता है कि आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपद से आश्विन कृष्णा पंचदशी अर्थात अमावस्या तक प्रेतलोक से पितृपुरुष की आत्मा धरती पर आती है. महालया के दिन पितृ लोगों का आना संपूर्ण होता है. गरुड़ पुराण, वायु पुराण, अग्नि पुराण आदि शास्त्रों के अनुसार-

आयुः पुत्रान् यशः स्वर्ग कीर्ति पुष्टि बलं श्रियम् ।

पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात् ।।

पितरों की कृपा बिना कुछ संभव नहीं है. उन्हें नमन कीजिए, प्रणाम कीजिए, स्तुति कीजिए, विश्वास कीजिए, तो समझिए कि बाधा रहित जीवन का मार्ग वे स्वयं प्रशस्त कर देंगे. अतः अपने पितरों को तिलांजलि के साथ-साथ श्रद्धाजंलि करने से उनका विशेष आशीर्वाद मिलता है. पितरों की प्रसन्नता से गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशुधन, सुख-साधन तथा धन-धान्यादि की प्राप्ति होती है. आलय इस दिन मह (अर्थात आनंदमय) हो उठता है. महालया जो पितृ पक्ष की समाप्ति, देवी पक्ष की शुरुआत मानी जाती है. दुर्गतिनाशिनी, दशप्रहरणधारिणी, महाशक्ति स्वरूपिणी मां दुर्गा का आगमन होता है. पूर्वी भारत के सबसे बड़ा त्योहार दुर्गा पूजा के सात दिन पहले महिषासुरमर्दिनी मां दुर्गा के आगमन की सूचना है. एक वर्ष बाद मां का धरती पर आने की सूचना पाकर सभी लोग आनंद, उमंग, उत्साह और खुशी से झूम उठते हैं, क्योंकि मां की कृपा से ऐश्वर्य, धन,सौंदर्य, सौभाग्य, कीर्ति, विद्या, बल, आयु, संतान, आनंदोपभोग, सुलक्षणा पत्नी, सुयोग्य पति, स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसलिए सभी ने मातृरूपेण, शक्तिरूपेण, लक्ष्मीरूपेण, शांतिरूपेण आदि मंत्रों से स्तुति करते हैं. और सभी प्रार्थना करते हैं एसो मां दुर्गा आमार घरे-एसो मां दुर्गा आमार घरे. क्योंकि श्रीदुर्गासप्तशती से कहा गया है-

या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः

पापात्मनां कृतधियां ह्दयेषु बुद्धिः।

श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा

तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम।।

जो पुण्यात्माओं के घरों में स्वयं ही लक्ष्मीरूप से, पापियों के यहां दरद्रितारूप से शुद्ध अंतःकरणवाले पुरुषों के हृदय में बुद्धि रूप से तथा कुलीन मनुष्य में लज्जारूप से निवास करती है, उन आप भगवती दुर्गा को हम नमस्कार करते हैं. देवि! आप संपूर्ण विश्व का पालन कीजिए.

इसी दिन अर्थात शारदीय नवरात्र के एक दिन पहले महालया को सर्व शक्ति स्वरूपिणी मां दुर्गा के आगमन के लिए मां की स्तुति करने की निरंतर प्रवहमान परंपरा रही है. महालया को जगत जननी दुर्गा की स्तुति अपरिहार्य है. महालया के दिन प्रातः चार बजे रेडियो एवं दूरदर्शन के चैनलों में मां दुर्गा के आगमन के सूचना को लेकर विशेष कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है. बीरेंद्र कृष्ण भद्र का महिषासुरमर्दिनी सबसे खास है.शाक्त तंत्रों में कहा गया है कि मानव-जीवन समस्या और संकटों की सत्यकथा है. अतः सांसारिक कष्टों के दलदल में फंसे मनुष्यों को मां दुर्गा की उपासना करनी चाहिए. वह आद्याशक्ति एकमेव एवं अद्वितीय होते हुए भी अपने भक्तों को काली, तारा, षोड़शी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला-इन दश महाविद्याओं के रूप में वरदायिनी होती हैं. अपने भक्तों का दुःख दूर करने के लिए : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री-इन नवदुर्गाओं के रूप में अवतरित होती हैं. सत्व, रजस्, तमस् इन तीन गुणों के आधार पर वह महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के नाम से लोक में प्रसिद्ध हैं. रूद्रायलतंत्र में आद्याशक्ति के दुर्गा नाम का निर्वचन करते हुए निरूपित किया गया है कि -जो दुर्ग के समान सुविधा और सुरक्षा देती है,अथवा जो दुर्गति का नाश करती हैं, वही जगत जननी दुर्गा कहलाती है.

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