मधुमक्खियां बचेंगी, तभी यह दुनिया भी बचेगी

World Bee Day : जलवायु परिवर्तन और कृषि रसायनों का प्रभाव मधुमक्खियों के लिए दोहरी मार साबित हो रहा है. बीते छह दशक में भारत की खेती में मोनोकल्चर, यानी ‘एकल फसल कृषि’ का चलन बढ़ा है. इससे मधुमक्खियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटी है.

By Prabhat Khabar Digital Desk | May 20, 2026 3:14 PM

अनील प्रसाद हेगड़े, पूर्व सांसद-

World Bee Day : बीस मई यानी आज आधुनिक मधुमक्खी पालन के प्रणेता, एंटन जानसा का जन्मदिन है. यह दिन ‘विश्व मधुमक्खी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है. विदित है कि मधुमक्खियां खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. परागण (पॉलिनेशन) और पैदावार बढ़ाने में ये महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. दुनिया की खाद्य सुरक्षा का एक-तिहाई इन्हीं पर निर्भर है. मधुमक्खी और अन्य परागणकर्ता (पॉलिनेटर) के महत्व को उजागर करने, मधुमक्खियों के संरक्षण और उनके सामने मौजूद खतरों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से ही संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) ने इस दिन को ‘विश्व मधुमक्खी दिवस’ घोषित किया था.


इसे विडंबना ही कहेंगे कि वर्तमान कृषि प्रणाली में जहां मधुमक्खियां प्राकृतिक परागणकर्ता के रूप में खाद्य उत्पादन और फसल की पैदावार बढ़ाने में अमूल्य योगदान दे रही हैं, वहीं पैदावार बढ़ाने के नाम पर अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहे रासायनिक खाद और कीटनाशक मधुमक्खियों के अस्तित्व को ही संकट में डाल रहे हैं. जलवायु परिवर्तन और कृषि रसायनों का प्रभाव मधुमक्खियों के लिए दोहरी मार साबित हो रहा है. बीते छह दशक में भारत की खेती में मोनोकल्चर, यानी ‘एकल फसल कृषि’ का चलन बढ़ा है. इससे मधुमक्खियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटी है. असल में, विविध प्रकार के फूलों और पौधों की विविधता में कमी के कारण मधुमक्खियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है. कमजोर पोषण और कीटनाशकों का घातक संयोजन मधुमक्खियों की मृत्यु दर बढ़ा देता है, जिससे परागण की प्रक्रिया और कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान पहुंचता है. हालांकि, यह भी सच है कि दुनिया के कई देशों में मधुमक्खियों को बचाने के उपाय हो रहे हैं.


यूरोपीय संघ की साझा कृषि नीति (सीएपी) पर्यावरण के अनुकूल कृषि और जैव विविधता को बढ़ावा देने के लिए किसानों को विशेष आर्थिक सहायता प्रदान करती है. सीएपी के तहत किसानों को मधुमक्खियों और अन्य परागणकर्ताओं को आकर्षित करने वाले पौधे (फैसिलिया, कुट्टू/बकव्हीट, और सफेद तिपतिया घास) उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. इसके लिए किसानों को ‘इको स्कीम’ और ‘कृषि-पर्यावरण जलवायु उपाय’ के जरिये सब्सिडी दी जाती है. इसके साथ ही, यूरोपीय संघ के अनेक किसान मधुमक्खी पालकों को अपने खेतों में मधुमक्खियों के बक्से (बीहाइव) रखने के लिए आमंत्रित करते हैं.

इससे किसानों को अपनी पैदावार बढ़ाने में मदद मिलती है, और मधुमक्खी पालकों को आसानी से प्राकृतिक पराग (नेक्टर) मिल जाता है. यह पहल मुख्य रूप से जैव विविधता को बढ़ाने, परागण में सुधार करने और अंततः पैदावार को मजबूत करने के लिए की गयी है. यहां इस बात का जिक्र भी जरूरी है कि इयू ने ‘फार्म टू फोर्क’ रणनीति के तहत 2030 तक रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग को 50 प्रतिशत तक कम करने के लिए ‘सस्टेनेबल यूज रेगुलेशन’ (एसयूआर) नामक प्रस्ताव रखा था. पर यूरोप के कई देशों के किसानों ने इस कानून का कड़ा विरोध किया. किसानों के विरोध के चलते इस प्रस्ताव को वापस ले लिया गया. हालांकि, कई वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने इस निर्णय की आलोचना की है.


उधर भारत में एचटीबीटी कपास की खेती पर सरकार की ओर से प्रतिबंध है. भारत में सिर्फ बीटी कपास को मंजूरी मिली है (इसमें भी भारी मात्रा में कीटनाशक का प्रयोग किया जाता है). हालांकि, कई कपास उत्पादक किसान अवैध रूप से एचटीबीटी बीजों का उपयोग कर रहे हैं. किसान इस बीज को इसलिए पसंद कर रहे हैं, क्योंकि यह खरपतवार प्रबंधन की लागत कम करता है. असल में एचटी कपास ग्लाइफोसेट नामक खरपतवार नाशक को सहन कर सकता है, इसलिए किसान सीधे इस जहर का छिड़काव करते हैं, जिससे हाथ से निराई-गुड़ाई का खर्च बचता है. जबकि कृषि मंत्रालय और पर्यावरण समूहों ने चेतावनी दी है कि यह खरपतवार नाशक जैव विविधता को नुकसान पहुंचाता है तथा यह अन्य फसलों को भी प्रभावित कर सकता है. यूरोप और भारत में किसानों से संबंधित इन दो उदाहरणों से समझा जा सकता है कि किसान वही करेंगे, जो उन्हें उचित लगेगा. पर आर्थिक असमानता के इस दौर में किसानों को सीधे तौर पर दोष देना भी उचित नहीं है, क्योंकि वे अपनी पैदावार बढ़ाने के लिए इन रसायनों का उपयोग करते हैं. ऐसे में, ‘विश्व मधुमक्खी दिवस’ के अवसर पर हम सभी को मधुमक्खियों को बचाने, जैविक खेती करने या उसे प्रोत्साहित करने के लिए प्रयास करने का संकल्प लेना चाहिए. हमें समझना होगा कि मधुमक्खियां बचेंगी, तभी दुनिया भी बचेगी. 
 (ये लेखक के निजी विचार हैं.)