भारतीय राजनीति का बदलता चेहरा

बदलते वक्त के साथ देश की राजनीति भी बदलती जा रही है. सत्ता पाने के लिए शुरू से ही राजनीतिक दल विभिन्न प्रकार के हथकंडे अपनाते हैं. पहले तो जनता को लुभावने वादे की चाशनी में ढालने के लिए नेताओं ने राजनीति का चेहरा बदला. जब उससे लोगों का मोहभंग होना शुरू हो गया, तो […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | September 19, 2015 9:13 AM

बदलते वक्त के साथ देश की राजनीति भी बदलती जा रही है. सत्ता पाने के लिए शुरू से ही राजनीतिक दल विभिन्न प्रकार के हथकंडे अपनाते हैं. पहले तो जनता को लुभावने वादे की चाशनी में ढालने के लिए नेताओं ने राजनीति का चेहरा बदला. जब उससे लोगों का मोहभंग होना शुरू हो गया, तो जातिवाद, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर लोगों को बांटा गया.

इस बीच राजनीति का दो चेहरा भी नजर आने लगा. एक सेक्यूलर कहलाया और एक नॉन-सेक्यूलर. खुद को सेक्यूलर कहनेवाली पार्टियों के नेताओं ने खुद को अल्पसंख्यकों का हमदर्द साबित करना शुरू किया, तो नॉन-सेक्यूलर पार्टियां देश के बहुसंख्यकों की हितैषी बताने लगीं. फिलहाल, देश में राजनीति का एक नया चेहरा जो उभर कर सामने आया है, उसमें न तो कोई सेक्यूलर है और न ही नॉन-सेक्यूलर. इस समय इसका सिर्फ और सिर्फ एक ही अतिवादी चेहरा है.

मतलब यह कि इस समय देश में अतिवाद के सामने अतिवाद ही खड़ा है. ऐसे में देश के लोगों को सोचना पड़ रहा है कि अगर देश में राजनीति का यही चेहरा हमेशा के लिए लोगों के सामने रहेगा और इसी के जरिये राजनीतिक दल एक-दूसरे से भिड़ते रहेंगे, तो देश के उस संविधान का क्या होगा, जो लोकतंत्र में धर्मनिरपेक्षता की पैरवी करता है? तो क्या देश में ऐसे ही राजनीति आगे बढ़ती रहेगी, जिसमें सिर्फ अतिवादी ही सत्ता के शिखर तक पहुंचेंगे? देश के सभी राजनीतिक दलों का दृष्टिकोण स्पष्ट हो चुका है. तथाकथित सेक्यूलर दलों को भी लोग समझने लगे हैं. ऐसे में, लोगों के लिए यह समझ पाना कठिन नहीं है कि वे किसे अपनी जिम्मेदारी सौंपें. इस बीच एक सवाल भी खड़ा होता है कि क्या इस देश में ऐसा कोई नेता नहीं होगा, जिसके लिए देश सर्वोपरि हो?

Àफैज आलम, मनोहरपुर