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कितने सबूत दें

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सुरक्षा बलों ने पाकिस्तानी आतंकवादी सज्जद अहमद को जीवित गिरफ्तार कर एक बार फिर पड़ोसी देश के खतरनाक इरादों को बेनकाब किया है.इसी महीने उधमपुर में बीएसएफ के काफिले पर हमला करनेवाले पाकिस्तानी आतंकी नावेद को जीवित पकड़ा गया था. गुरदासपुर हमले के आतंकी भी पाकिस्तान से ही आये थे.

छद्म युद्ध चला रहे पाकिस्तान के राजनीतिक और सैनिक नेतृत्व ने आतंकवाद को संरक्षण, सहयोग और समर्थन देने के भारतीय आरोपों को हमेशा खारिज किया है. पाकिस्तान पर कश्मीर से अफगानिस्तान तक और दुनिया के अन्य कई हिस्सों में चरमपंथी हिंसात्मक गतिविधियों को उकसाने के आरोप संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, ब्रिटेन आदि ने भी लगाये हैं.

मुल्ला उमर, ओसामा बिन लादेन, दाऊद इब्राहिम, मसूद अजहर, हाफिज सईद, टाइगर मेमन, जकीउर रहमान लखवी जैसे खतरनाक सरगनाओं की शरणस्थली पाकिस्तान ही रहा है.

अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा लश्करे-तय्यबा, जमात-उल दावा जैसे गिरोहों पर पाबंदी के बावजूद इनसे जुड़े चरमपंथी पाकिस्तान में खुलेआम अपनी गतिविधियां चलाते हैं. पाकिस्तान का आम नागरिक भी इन गुटों की हिंसा का शिकार बनता रहा है, लेकिन हिंसा और अस्थिरता को कूटनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की पाकिस्तान को लत-सी लग गयी है.

जब भी उसके सामने अकाट्य तथ्य रखे जाते हैं, वह उलटे भारत पर ही पाकिस्तान को अस्थिर करने के आरोप मढ़ने लगता है. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक रद्द होने से पहले ऐसा ही हुआ था और अब सज्जद के पकड़े जाने पर भी वह यही रट लगा रहा है.

भारत ने बार-बार कहा है कि अगर पाकिस्तान के पास आरोपों के पक्ष में ठोस सबूत हैं, तो वह उन्हें भारत के सामने प्रस्तुत करे. परंतु, पाकिस्तान सरकार के पास इसका नैतिक साहस नहीं है. जबकि भारत ने अपने आरोपों के समर्थन में पुख्ता सबूत और दस्तावेज कई बार पेश किये हैं.

पाकिस्तानी आतंकियों की भारत में हो रही गिरफ्तारी पाक हुक्मरानों के सामने सवाल है कि अपने अपराध कबूलने के लिए उन्हें और कितने सबूत चाहिए? समय आ गया है कि सीमा पर युद्ध विराम के उल्लंघन, घुसपैठ, आतंक को प्रश्रय देने की पाकिस्तान की हरकतों से निपटने के लिए भारत सरकार और कारगर रणनीति बनाये.

देश की आंतरिक सुरक्षा को चाक-चौबंद करने के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान पर दबाव बनाने के कूटनीतिक प्रयास भी और तेज किये जाने चाहिए.

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