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फर्ज निभाना इनसे सीखिए

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अनुज कुमार सिन्हा

वरिष्ठ संपादक

प्रभात खबर

भारत का कानून-संविधान कोई भेदभाव नहीं करता. कानून सभी के लिए बराबर है. चाहे वह गरीब हो या अमीर, मंत्री हो या ठेलेवाला. लेकिन हकीकत कुछ और है. कमजोर पर ही जुल्म होता है. अब समय आ गया है कि इसमें सुधार हो. लोगों को अपने अंदर झांकना पड़ेगा.

पटना के जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल एयरपोर्ट टर्मिनल पर गलत तरीके से अंदर जा रहे केंद्रीय मंत्री रामकृपाल यादव को सीआइएसएफ की महिला कांस्टेबल शशि लकड़ा ने रोक दिया. मंत्री निकासी द्वार से अंदर जाना चाहते थे. अंतत: मंत्री को अपनी गलती का अहसास हुआ और वे वहां से हट गये. इस घटना से 33 साल पुरानी एक चर्चित घटना याद आ गयी.

अगस्त 1982 में दिल्ली में किरण बेदी की टीम के एक सब इंस्पेक्टर निर्मल सिंह ने नो पार्किंग जोन में पड़ी प्रधानमंत्री कार्यालय (तब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थी) की एक अंबेसडर कार को क्रेन से उठवा कर चालान काट दिया था. उस घटना के बाद से किरण बेदी को क्रेन बेदी के नाम से जाना जाने लगा था.

तब किरण बेदी दिल्ली की डीसीपी (ट्रैफिक) थीं. हालांकि, कार को सब इंस्पेक्टर ने उठाया था, लेकिन तब नाम हुआ था किरण बेदी का. दाद देनी होगी उस सब इंस्पेक्टर निर्मल सिंह की, जिन्होंने साहस भरा काम किया था.

यह जानते हुए भी कि यह प्रधानमंत्री कार्यालय की कार है. बाद में उस सब इंस्पेक्टर का तबादला कर दिया गया था, जिसके तबादले के पत्र पर किरण बेदी ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था. इस घटना से यह संदेश गया था कि ईमानदार-कर्तव्यनिष्ठ अफसरों की कमी नहीं है. फर्ज सबसे ऊपर है. नियम सभी के लिए बराबर है.

पटना में केंद्रीय मंत्री को एक कांस्टेबल ने रोक कर अपना फर्ज निभाया है. शशि लकड़ा झारखंड की मूल निवासी है. रोकने के पहले अगर शशि अपने भविष्य के बारे में सोचती, तो शायद वह इतना बड़ा कदम नहीं उठा पाती. संभव हो कि भविष्य में उसे इसकी कीमत भी चुकानी पड़े. लेकिन शशि या उसके जैसे अधिकारियों-कर्मचारियों को इसके लिए भी तैयार रहना चाहिए.

देश नियम-कानून से चलता है. इसे तोड़ने की इजाजत किसी को भी नहीं मिलनी चाहिए. आज अगर 1982 की घटना को याद करते हुए किरण बेदी या निर्मल सिंह की चर्चा होती है, तो सिर्फ इसलिए क्योंकि उन लोगों ने फर्ज निभाया था. आनेवाले दिनों में शशि लकड़ा को भी इन्हीं कारणों से याद किया जायेगा.

शशि खबर में नहीं आती.

वह आयी इसलिए क्योंकि उसने एक मंत्री को रोका. अगर हर पुलिसकर्मी ऐसा ही होता, तो वह खबर नहीं बनती. संभव हो कि कोई और पुलिस अधिकारी होता, तो मंत्री को जाने से नहीं रोकता. सोचता कि क्यों पंगा लिया जाये. सिर्फ रामकृपाल यादव की ही बात क्यों हो, आज तो अदना सा नेता भी इतना रौब दिखाता है कि पुलिसकर्मी विवाद में पड़ने से बचते हैं. पुलिस विभाग या प्रशासन के बारे में यह आम धारणा बन चुकी है कि नेताओं के सामने आने पर अफसर-कर्मचारी फर्ज भूल कर जी-हुजूरी में लग जाते हैं.

वर्दी का महत्व भूल जाते हैं. उनकी गलती भी नहीं है. राजनीति में जिस तरीके से बदलाव आया है, वहां काम करनेवाले अच्छे अफसरों की पूछ कम हो गयी है. देश-फजर्, कर्तव्य पीछे चला गया है. इन्हें पता है कि मंत्री-नेता का जूता उठाने से, पैर छूने से अगर बेहतर जगह पोस्टिंग होती है, प्रमोशन होता है, तो इसमें हर्ज क्या है?

लेकिन शशि लकड़ा की कहानी नेता और अफसर दोनों के लिए आंख खोलनेवाली है. नेता जान लें कि हर पुलिस अधिकारी उनके इशारे पर पूंछ नहीं हिला सकता. अच्छे अफसर-कर्मचारी, पुलिसकर्मी अपने फर्ज से नहीं डिगते, चाहे उसकी कितनी बड़ी कीमत भी क्यों न चुकानी पड़े. इसलिए नेता खुद अपना आचरण सुधारें. अफसरों-कर्मचारियों के लिए भी यह चिंतन का वक्त है. आप सरकार के नौकर हैं, सरकार आपको वेतन देती है, नेता नहीं. इसलिए फर्ज निभाओ. नेता के आगे झुको नहीं.

आज पुलिस क्यों बदनाम है? इसलिए कि वह जनता में फर्क देखती है. लाल-पीली बत्तीवाली गाड़ी अगर नो पार्किग में खड़ी है, तो पुलिसवालों की हिम्मत नहीं होती उसे हटाने की. अगर कोई सामान्य व्यक्ति की गाड़ी हो, तो फिर इन पुलिस अफसरों की अक्कड़ देखिए. बात करने का तरीका बदल जायेगा. जरा सा तर्क दिया तो दो-चार डंडा भी लग सकता है.

भारत का कानून-संविधान कोई भेदभाव नहीं करता. कानून सभी के लिए बराबर है. चाहे वह गरीब हो या अमीर, मंत्री हो या ठेलेवाला. लेकिन हकीकत कुछ और है. कमजोर पर ही जुल्म होता है. अब समय आ गया है कि इसमें सुधार हो. देश में कई जगहों पर नेता अपनी धाक दिखाते हैं और जब सामनेवाला मजबूत निकलता है, तो वे रास्ते पर आ जाते हैं.

अभी यूपी में सपा के एक नेता के बॉडीगार्ड ने एक महिला के साथ र्दुव्‍यवहार किया, उसका मोबाइल फोन तोड़ दिया, तो महिला चुप नहीं बैठी. गाड़ी रोक कर उसकी छत पर चढ़ गयी, हंगामा किया और अंतत: नेता ने फोन का पैसा दिया. ये सब घटनाएं बताती हैं कि समय बदल रहा है. लोगों को अपने अंदर झांकना पड़ेगा. फर्ज और देश-कानून सबसे ऊपर है. इसका सम्मान करिए.

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