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Home Opinion आदिम जनजातियों पर ध्यान जरूरी

आदिम जनजातियों पर ध्यान जरूरी

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अलग झारखंड राज्य बनाने के पीछे जनजातियों, खासकर आदिम जनजातियों की चिंता सवरेपरी रही. लेकिन 15 साल बाद भी इनकी स्थिति में कोई तुलनात्मक बदलाव नहीं दिख रहा. हाल ही में सबर (आदिम जनजाति) पर जो रिपोर्ट आयी,चिंताजनक है.

बिरसा आवास भले दिया गया हो, मुफ्त में 35 किलो चावल भले मिल रहा हो लेकिन सबरों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर किसी का ध्यान नहीं गया.

यही कारण है कि घाटशिला के दारीसाई स्थित सबरों की बस्ती की आबादी साल दर साल घटती जा रही है. पिछले पांच सालों में यहां 55 में से 23 सबरों की मौत हो गयी. ज्यादातर मौतें असामयिक थीं. या तो इनके पास खाना नहीं था, या फिर इलाज के पैसे नहीं.

स्वास्थ्य या अन्य सरकारी सेवाओं के प्रति जागरूकता की कमी भी बड़ी वजह है. चरमराई स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं के भरोसे इन्हें छोड़ दिया जाना इनके प्रति सरकारी उदासीनता को भी दिखाता है. आदिम जनजातियों को लेकर योजनाएं या तो कागजों पर चल रही हैं, या फिर उनका इनके लिए उपयोग नहीं है.

आदिम जनजातियों को मुख्यधारा में भी जोड़ने की तमाम कोशिशें बेकार साबित हुई हैं. इनके स्वास्थ्य और शिक्षा के मुद्दे को गंभीरता से लेने की जरू रत है, इन्हें पारंपरिक सरकारी योजनाएं जैसे आंगनबाड़ी, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. स्वास्थ्य और शिक्षा के रास्ते ही इन्हें मुख्यधारा में शामिल किया जा सकता है.

इसके लिए विशेष रणनीति की आवश्यकता है. ऐसी योजनाएं या प्रणाली विकसित करने की जरू रत है, जो तात्कालिक ना होकर दीर्घकालिक हों. इनकी भाषा और संस्कृति से जोड़ कर ही हम स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों को इनके बीच ले जा सकते हैं. अब तक हुई कोशिशों में इसकी कमी रही है. सामान्य तौर पर परिपाटी रही है कि कहीं भी बड़ी बीमारी उजागर होने के बाद इन्हें शहरी सरकारी अस्पतालों में भरती करा दिया जाता है. लेकिन इन्हें नियमित स्वास्थ्य जांच और सुविधाएं नहीं मिल पातीं. बीमारी जब महामारी का रू प ले लेती है तो ही हमारा प्रशासन जागता है.

शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को इन आदिम जनजातियों के बीच सजगता और सहजता से कैसे ले जाया जा सकता है, इस पर माथापच्ची जरू री है. यदि यह नहीं होता तो संभव है कि झारखंड बनने के पीछे के सपने महज सपने ही रह जायें.

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