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बेहतर समाज के लिए अच्छा संस्कार

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21वीं सदी के इस विकासवादी समय में भी महिलाओं पर होनेवाले अत्याचारों में कमी आने के बजाय वृद्धि ही हो रही है. महिलाओं में शिक्षा के प्रति जागरूकता जितनी ज्यादा बढ़ी है, उसी अनुपात में उन पर होनेवाले अत्याचार का अनुपात भी बढ़ा है. समाज में नशाखोरी और दहेज के लिए मासूमों की बलि चढ़ाई जा रही है. बच्चियों से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक को दुष्कर्म का शिकार बनाया जा रहा है. आखिरकार इन सभी घटनाओं की भुक्तभोगी महिलाओं को ही होना पड़ रहा है.

जिस तेजी से महिलाएं अत्याचार का शिकार हो रही हैं, हमारा समाज उसी रफ्तार से पतन की ओर अग्रसर हो रहा है. समाज में इस प्रकार की परिस्थिति के पैदा होने के पीछे सारा दोष कहीं न कहीं हमारा ही है. हम अपने बच्चों को सब कुछ देने के बावजूद अच्छा संस्कार नहीं दे पाते हैं. बच्चे भी हमारी बातों पर गौर नहीं करते, क्योंकि हमने उनमें वह आदत ही नहीं डाली है. हमें याद रखना चाहिए कि हम महात्मा गांधी, विवेकानंद, भगत सिंह और श्रीराम शर्मा जैसे लोगों के देश में निवास करते हैं. इसलिए हमें हर काम सोच-समझ कर करना चाहिए.

बेटे आौर बेटी दोनों को एक समान और एक संस्कार प्रदान करना चाहिए. बिना किसी भेद-भाव के उनका सही मार्गदर्शन करना चाहिए. देश और समाज का सही निर्माण तभी संभव है, जब हम अपने बच्चों को संस्कार दे पायेंगे. हमें बेटों में बहनों को समझने और सम्मान देने की परंपरा का विकास करना होगा. हालांकि, हमारे देश में नारियों के सम्मान की परंपरा पुरानी है, लेकिन बदलते परिवेश में लोगों की सोच बदल गयी है. बदलते परिवेश में अच्छे देश और समाज के निर्माण के लिए हमें अच्छे संस्कार को भी बढ़ावा देना होगा.

रागिनी मिश्र, जमशेदपुर

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