यह भी भुलाना असंभव है कि ओबामा के साथ दोस्ती का सहारा लेकर, भारतवंशियों को प्रभावशाली औजार के रूप में इस्तेमाल कर वह उस महाशक्ति के साथ मनोमालिन्य को काफी कम करने में भी कामयाब रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया और कनाडा, जो अमेरिका के इशारे पर भारत का प्रतिरोध करते रहे हैं- खास कर परमाणविक अप्रसार के बहाने- अब पटरी पर लाये जा चुके हैं. बहुपक्षीय राजनयिक मंचों पर (ब्रिक्स और जी-20 वाले) भारत अपना पक्ष मजबूती से रख सका है. अर्थात् अब तक चीन को यह संकेत स्पष्ट रूप से पहुंचाया जा सका है कि भारत विकल्पहीन नहीं है और न ही अपने उदीयमान अवतार में चीन के सामने दयनीय मुद्रा में है. इस बार भी चीन के साथ इस दौरे में मंगोलिया तथा दक्षिण कोरिया को शामिल किया गया है. चीन के लिए यह गलतफहमी पालना नादानी होगी कि उसे खास भाव मिल रहा है.
अगर संबंध प्रगाढ़ बनाये जाने हैं, तो अतीत में ही कैद रहने से कुछ हासिल होनेवाला नहीं है और यह भी कहा कि यथास्थिति बरकरार रखनेवाला विकल्प भी समाधान नहीं है. उन्होंने चीन को दूरदर्शी रवैया अपना कर भारत के साथ अंतरराष्ट्रीय मंच पर जुगलबंदी साधने का आमंत्रण दिया, पर इसके लिए पहले नयी सोच की जरूरत को रेखांकित किया.
