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स्वाइन फ्लू को हमने ही तो दिया जन्म

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स्वाइन फ्लू ने महामारी का रूप ले लिया है. देश भर में अब तक इसकी वजह से एक हजार से भी ज्यादा लोग मौत के आगोश में समा चुके हैं और हजारों की आबादी इसकी चपेट में है. चिंता की बात यह है कि इस पर नियंत्रण पाने की बजाय यह और तेजी से फैलती ही जा रही है. ऐसे में हर कोई जैसे खुद को असुरक्षित महसूस करने लगा है. सर्दी-जुकाम और हल्का बुखार आने पर भी लोग घबरा रहे हैं और अस्पतालों का रूख कर रहे हैं.

ऐसे में सरकार और गैर सरकारी संगठनों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण बन जाती है. जहां सरकारी एजेंसियों को अपने स्तर से लोगों को जागरुक बनाने के लिए अभियान चलाने की जरूरत है, वहीं गैर सरकारी संगठन भी घर-घर जाकर इस बीमारी के प्रति जागरुकता फैला कर बाकी लोगों को इसकी चपेट में आने रोक सकते हैं. एक बात तो है कि अब हमारा संसार विनाश की ओर चल पड़ा है. यह बात हम सभी को कड़वी लग सकती है, लेकिन सच्चई से आखिर कब तक मुंह मोड़ेंगे हम? ऐसी परिस्थितियां पैदा करने के लिए आखिर जिम्मेवार भी तो हम खुद ही हैं.

कितनी बार हमें चेताया गया कि प्रदूषण पर हम लगाम कसें और प्रकृति का अंधाधुंध दोहन बंद करें, लेकिन हम हैं कि किसी की सुनना ही नहीं चाहते. विकास की इस तीव्र रफ्तार में हम इतने ज्यादा स्वार्थी बन गये कि भूल ही गये कि पर्यावरण क्या चीज है और यदि इसे नुकसान पहुंचाया गया, तो भविष्य में हमें इसके क्या दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं. हम तो बस अपनी ही धुन में इसे निचोड़ते चले गये और अंतत: ऐसी स्थिति पैदा हो गयी कि प्रकृति ने हमसे बदला लेना शुरू कर दिया. आखिर स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियां हमारे ही तो करतूतों की देन हैं.

किशोरी मंडल, मयूर चौक, बेकापुर, मुंगेर

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