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Home Opinion रेलवे के योजनाबद्ध विकास की दूरदृष्टि

रेलवे के योजनाबद्ध विकास की दूरदृष्टि

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रेल मंत्री सुरेश प्रभु द्वारा रेल बजट कुछ मायनों में लीक से हट कर है. यह पहला ऐसा बजट है, जिसमें किसी नयी ट्रेन की घोषणा नहीं है. उनके अनुसार ऐसी कोई घोषणा पटरियों की क्षमता और नवीनीकरण की प्रक्रिया की हो रही समीक्षा के बाद ही की जायेगी, जो इसी सत्र में संभावित है. तेल की कीमतों में कमी के कारण किराये में वृद्धि का कोई दबाव नहीं था और पिछले रेल बजट के पहले ही नयी सरकार ने यात्री किराये में 14.2 फीसदी और माल भाड़े में 6.5 फीसदी की वृद्धि की थी.

तब यात्री किराये में वृद्धि एक दशक के बाद हुई थी. इस बजट में यूरिया, रसोई गैस, कोयला जैसी कुछ जरूरी चीजों के ढुलाई भाड़े में वृद्धि हुई है, जिसका असर कीमतों पर पड़ सकता है. आम यात्रियों के नजरिये से देखें, तो बजट में उनकी परेशानियों के समाधान पर जोर है. आगामी पांच वर्षो में रेलयात्रियों की संख्या 2.1 करोड़ प्रतिदिन से बढ़ा कर तीन करोड़ करने का लक्ष्य रखनेवाले सुरेश प्रभु ने यात्री-सुविधाओं पर खर्च में 67 फीसदी का इजाफा किया है, जो यात्र सुगम और सुरक्षित बनाने की उनकी प्राथमिकता का सूचक है. हालांकि आलोचकों की यह बात भी सही है कि ऐसी घोषणाएं पहले भी होती रही हैं, उनके नतीजे बहुत सकारात्मक नहीं रहे हैं.

भारतीय रेल सुविधाओं के मामले में पिछड़ेपन का शिकार है और उसकी आर्थिक दशा बदहाल है. निवेश में लगातार कमी आयी है. जीडीपी में आम तौर पर एक फीसदी हिस्सेदारी रखनेवाले रेलवे का हिस्सा 2012-13 में 0.9 फीसदी रह गया था. लंबित परियोजनाओं के लिए मूल अनुमानित लागतों के आधार पर ही 4,91,510 करोड़ रुपये की दरकार है. प्रतिवर्ष 4,500 किलोमीटर नयी पटरियों की अपेक्षा होती है, परंतु वित्तीय तंगी से नवीनीकरण की गति धीमी है और बकाया बढ़ रहा है. हालांकि, प्रभु ने रेल के कायाकल्प का जो खाका खींचा है, उसकी स्पष्टता इस बजट को पूर्ववर्ती रेल बजटों से अलग करती है. बजट में अगले पांच वर्षो में 8.5 लाख करोड़ रुपये के निवेश तथा पटरियों में 10 फीसदी की वृद्धि कर 1.38 लाख किलोमीटर तक करने का लक्ष्य रखा गया है. इस धन को जुटाने के लिए ऐसे उपाय सुझाये गये हैं, जिनकी परिकल्पना पहले के बजटों में नहीं थी. पहली बार ऐसा हो रहा है, जब इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की प्रक्रिया में राज्यों और केंद्रीय मंत्रलयों को सहभागी बनाया जायेगा. बजट के तुरंत बाद मंत्री ने लोकसभा टेलीविजन पर एक इंटरव्यू में बताया कि जरूरी धन राशि दीर्घ अवधि के ¬ण द्वारा जुटायी जायेगी. किराया बढ़ा कर धन उगाहने के आसान और आलसी रास्ते के बजाये उन्होंने योजनाबद्ध दृष्टिकोण की राह अपनायी है. मंत्री को बाजार से सकारात्मक रुख की उम्मीद है, जिसमें निजी क्षेत्र और सार्वजनिक बचत व निवेश कोष शामिल हैं.

अब उनके विजन की सफलता निवेश के परिमाण पर निर्भर करेगी. भारतीय रेल दुनिया की सबसे बड़ी व्यावसायिक इकाई है, लेकिन इस विशाल और व्यापक तंत्र का प्रबंधन और प्रशासन अत्यधिक केंद्रीकृत है. प्रभु इस कार्यशैली में बदलाव कर क्षेत्रीय प्रबंधन, संबंधित विभागों और उपक्रमों को अधिक स्वायत्तता देने की बात कर रहे हैं. सार्वजनिक अर्थव्यवस्था में निवेश का प्रश्न जब भी आता है, निजीकरण को लेकर वाजिब चिंताएं उभरने लगती हैं. इस सरकार के पहले रेल बजट की घोषणाओं के बाद रेल कर्मचारियों और जानकारों ने ऐसी शंकाएं जतायी थीं. कुछ समय पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बयान देना पड़ा था कि रेलवे में निजीकरण का कोई सरकारी इरादा नहीं है. बजट में इस आश्वासन की झलक स्पष्ट है. परिसंपत्तियों को निजी क्षेत्र में हस्तांतरित करने के बजाये उसे निवेश और सहभागिता से साथ लेना श्रेयस्कर है. विशेषज्ञ कहते रहे हैं कि अर्थव्यवस्था के मौजूदा माहौल के अनुरूप भारतीय रेल को निगमित करने की जरूरत है. कोंकण रेल और दिल्ली मेट्रो इस प्रक्रिया की सफलता के उदाहरण हैं.

रेल के अधीन इरकॉन, राइट्स जैसे उपक्रम हैं, जो आंतरिक इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के साथ बाहरी व्यवसाय से भी आमदनी करते हैं. बजट में निगमों के द्वारा निजी क्षेत्र, राज्यों, मंत्रालयों और सार्वजनिक उपक्रमों की साङोदारी बनाने के संकेत हैं. उम्मीद करनी चाहिए कि प्रभु की इस बजटीय ‘भव्य कार्ययोजना’ के जरिये भारतीय रेल के ‘अच्छे दिन’ की ओर यात्र के संकेत आगामी दिनों में दिखने शुरू होंगे. बहरहाल, गांधी सर्किट पर यात्रियों को आकर्षित करने की इच्छा रखनेवाले सुरेश प्रभु को 1921 में रेल पर लिखे गांधी के उस लेख पर भी ध्यान देना चाहिए, जिसमें उन्होंने शीर्षस्थ प्रशासकों को बिना पूर्व सूचना के आम यात्रियों की तरह रेल में सफर करने की सलाह दी थी, ताकि उन्हें आम यात्रियों की परेशानी की जानकारी हो सके.

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