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Home Opinion किसानों को लेकर बैंकों की बेरुखी

किसानों को लेकर बैंकों की बेरुखी

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बिहार में किसानों के प्रति बैंकों का उदासीन रवैया खेती-बारी पर भारी पड़ रहा है. बैंक किसानों को खेती के लिए किसान क्रेडिट कार्ड भी बना कर नहीं देना चाहते हैं. राज्य के वित्त मंत्री दर्जनों बार बैंकों से कह चुके हैं कि किसानों को जल्द से जल्द से क्रेडिट कार्ड उपलब्ध कराया जाये. मगर, बैंक इस आग्रह को अनसुनी कर रहे हैं.
साल 2014-2015 में बिहार में बैंकों को कुल 15 लाख किसान क्रेडिट कार्ड बनाने हैं. लेकिन नवंबर अंत तक केवल चार लाख 29 हजार किसान क्रेडिट कार्ड जारी किये गये हैं. बैंकों के इस रवैये के कारण खेती-बारी को जबरदस्त नुकसान हो रहा है. रबी की फसल का समय है. गेहूं व अन्य रबी फसलों की बुआई के लिए किसानों को महाजन से कर्ज लेना पड़ रहा है, क्योंकि उनके पास बैंक से कर्ज लेने का कोई साधन नहीं है.
अब राज्य सरकार ने बैंकों को यह निर्देश दिया है कि सभी अपनी शाखाओं में हर बुधावार को कैंप लगा कर किसान क्रेडिट कार्ड बनायें, जिससे किसानों को राहत मिल सके. हर साल सरकार नवंबर-दिसंबर में इस तरह के निर्देश जारी करती है. इस निर्देश का थोड़ा लाभ भी मिलता है. कैंप के नाम पर बैंक की शाखाओं में सौ-पचास केसीसी बना दिये जाते हैं.
लेकिन बैंकों का रवैया टालू ही होता है. राज्य सरकार को किसानों के मामले में बैंकों के इस टालू रुख को बदलने के लिए सख्त कार्रवाई करनी होगी. केसीसी बनाने का लक्ष्य समय पर पूरा हो, इसके लिए बैंकों पर सख्त निगहबानी का एक तंत्र राज्य सरकार को विकसित करना होगा. हर सप्ताह कितना केसीसी बना, कितना किसानों तक पहुंचा, इन आंकड़ों की समीक्षा अगर बैंकों के उच्च अधिकारी व सरकार के सचिव स्तर के अधिकारी संयुक्त तौर पर करेंगे, तो बैंक की शाखाओं तक में केसीसी बनाने का दबाव काम करेगा. अभी एक रूटीन की तरह बैंक की शाखाओं तक यह सूचना भेज दी जाती है कि साप्ताहिक कैंप लगा कर केसीसी बनाया जाये.
फिर तीन महीने के बाद इस आदेश की समीक्षा होती है कि कितना केसीसी बना है. तीन महीने में इतना वक्त गुजर जाता है कि केसीसी के जरूरतमंद किसानों को कोई फायदा नहीं मिलता है. साथ ही, सरकारी आदेश को नहीं मानने वाले बैंक अधिकारियों पर भी कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है.
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