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सरकारी अस्पतालों के अच्छे दिन कब?

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यह खबर चौंकाने वाली है कि एक जिला स्तरीय अस्पताल में साढ़े तीन सालों से एक भी ऑपरेशन नहीं हुआ है. पाकुड़ सदर अस्पताल में न कोई सजर्न है, न ऑपरेशन के लिए जरूरी उपकरण.

कोडरमा सदर अस्पताल में 10 महीनों से प्रसव के लिए सीजेरियन ऑपरेशन का इंतजाम नहीं है. इसी तरह चतरा सदर अस्पताल में ब्लड बैंक का इंतजाम नहीं है. यह हालत है उन अस्पतालों की, जिन पर अपने-अपने जिले के लोगों की सेहत और परिवार कल्याण की जिम्मेदारी है.

जब राज्य में जिले के अस्पतालों का यह हाल है, तो उससे नीचे के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और डिस्पेंसरियों की क्या हालत होगी, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. रांची सदर अस्पताल का 500 बिस्तरों वाला नया भवन एक अरसे से बन कर तैयार है, लेकिन तकनीकी दावं-पेच के नाम पर इसे अब तक चालू नहीं किया गया है.

दुनिया भर के अनुभव यही बताते हैं कि स्वास्थ्य व्यवस्था तभी बेहतर हो सकती है, जब लोगों की समस्याओं का निदान सही स्तर पर हो जाये. जिन चीजों का इलाज जिला स्तर पर हो सकता है, अगर वह वहीं हो जाये, तो लोगों को बेवजह रिम्स या अन्य मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में नहीं आना पड़ेगा. इससे मरीजों को सहूलियत होगी, उन पर आर्थिक बोझ कम पड़ेगा, साथ ही व्यवस्था भी बनी रहेगी.

रिम्स जैसे राज्य स्तरीय अस्पताल मरीजों के बोझ तले दबेंगे नहीं. इसी तरह प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को दुरुस्त करके ही जिला अस्पतालों को अत्यधिक भीड़ से बचाया जा सकता है. आज सरकारी अस्पतालों को ठीक करना किसी भी सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. निजी अस्पतालों में इलाज कराना इतना महंगा हो गया है कि कोई बड़ी बीमारी होने पर किसी की जिंदगी भर की जमा पूंजी खर्च हो सकती है.

जब तक हर इनसान को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल जाती है, तब तक अच्छे दिन का सपना साकार नहीं हो सकता है. दुनिया में ऐसे अनेक देश हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति हमसे कमजोर है, लेकिन स्वास्थ्य सुविधा हमसे कहीं बेहतर है. स्वास्थ्य के मामले में निजी क्षेत्र पर निर्भरता की सरकारी नीति घातक है.

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