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Home Opinion खेल प्रबंधन में ऐसी खामियां कब तक!

खेल प्रबंधन में ऐसी खामियां कब तक!

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दक्षिण कोरिया के इंचियोन में 19 सितंबर से शुरू हो रहे एशियाई खेलों में भाग लेनेवाले भारतीय दल के आकार पर निर्णय तो हो गया है, पर इस प्रकरण ने देश में खेलों के प्रबंधन के स्तर पर पुन: प्रश्न-चिह्न लगा दिया है. देश में खेलों के विकास और प्रसार का प्रभार खेल मंत्रालय, भारतीय ओलिंपिक एसोसिएशन और विभिन्न खेल संघों के जिम्मे है. लेकिन, एक कारगर खेल नीति न होने और इन संस्थाओं में आपसी सामंजस्य के अभाव के कारण इनके बीच अकसर खींचतान चलती रहती है, जिसका नकारात्मक प्रभाव खिलाडि़यों के प्रदर्शन पर पड़ता है.

निर्णय लेने में देरी के कारण इंचियोन पहुंची हॉकी टीम और एथलेटिक्स दल को अपना पंजीकरण कराने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा. फुटबॉल टीमों को चीन में एक दिन अधिक रुकना पड़ा. ये टीमें शनिवार को इंचियोन पहुंचीं, जबकि उनके मुकाबले रविवार से ही शुरू होनेवाले थे. यह भी तब संभव हुआ, जब 14 खेलों में भाग न लेने की खेल मंत्रालय की संस्तुति में हस्तक्षेप करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फुटबॉल के अलावा वॉलीबॉल, हैंडबॉल और तैराकी में भी टीमें भेजने का निर्देश दिया.

इस बार ओलिंपिक संघ ने 35 खेलों में 662 खिलाडि़यों एवं 280 अधिकारियों को भेजने की अनुशंसा की थी, पर खेल मंत्रालय ने इसमें कटौती कर 516 खिलाडि़यों और 163 अधिकारियों को ही मंजूरी दी, जो 28 खेलों में भाग लेंगे. बाद में 17 और नामों को मंजूरी मिली. इस कटौती के चलते पुरुष हॉकी टीम के कोच और वैज्ञानिक सलाहकार तथा महिला हॉकी टीम के फिजियोथेरेपिस्ट और वीडियो विश्लेषक टीम के साथ नहीं जा सके हैं.

25 टीमों के मैनेजरों को भी जाने की अनुमति नहीं मिली है और अब कोच को ही मैनेजर की भूमिका भी निभानी पड़ रही है. निर्णय में देरी या अतार्किक कटौती के लिए सिर्फ सरकार जिम्मेवार नहीं है. नियमों के मुताबिक यह सूची 90 दिन पहले सरकार के पास भेजी जानी चाहिए थी, पर ओलिंपिक संघ ने सूची गत 21 अगस्त को भेजी. विभिन्न खेलों में खराब प्रदर्शन के चलते अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में टीम नहीं भेजने से तो देश में इन खेलों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा. बेहतर प्रबंधन और अवसर की उपलब्धता ही खेलों के अच्छे भविष्य की कुंजी है.

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