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कश्मीर : देर आयद, दुरुस्त आयद

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कश्मीर : देर आयद, दुरुस्त आयद

।। शुजात बुखारी ।।

वरिष्ठ पत्रकार

इसलामी देशों के संगठन या अरब लीग द्वारा पहले के बयान पाकिस्तान प्रायोजित थे और उनका इरादा भारत को महज परेशान करना था. इसी वजह से अलगाववादी एक फर्जी उम्मीद के झांसे में फंस गये थे.

पिछले एक महीने से गाजा पर नृशंस इजरायली हमले ने पूरी मानवता को शर्मसार कर दिया है. इसने शक्तिशाली देशों के दोहरेपन और मुसलिम देशों की असंवेदनशीलता व अयोग्यता को भी उजागर किया है. गाजा के बदनसीब लोगों की किस्मत चाहे जो हो, इस स्थिति से दुनिया भर के मुसलमानों के लिए कई सबक निकले हैं, जिन पर सोच-विचार की बहुत जरूरत है.

इसका एक खतरनाक परिणाम और अधिक मुसलमानों को अतिवाद की तरफ ढकेलना हो सकता है, जिससे तबाही के और मौके पैदा हो सकते हैं. इराक, सीरिया, अफगानिस्तान और अफ्रीका की विगत एक महीने की घटनाएं इन सवालों को भी उठाती हैं कि आखिर यह सब घटनाएं मुसलिम देशों में ही क्यों हो रही हैं. स्वयंभू खलीफा अल-बगदादी के नेतृत्व वाले इस्लामिक स्टेट द्वारा की गयी 6,000 से अधिक लोगों की हत्या ने ‘मानवाधिकार उल्लंघन’ शब्द को भी शर्मिदा कर दिया है. दुनिया के दूसरे सबसे बड़े धर्म इसलाम के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुसलमानों द्वारा की जा रही मुसलमानों की हत्या है.

कश्मीर के संदर्भ में इस स्थिति का एक सबक यह है कि अलगाववादियों ने इसलामी देशों के संगठन (ओआइसी) और अरब लीग के प्रतिनिधित्व वाले मुसलिम देशों पर भरोसा छोड़ दिया है. समय-समय पर इन संगठनों ने कश्मीर पर प्रस्ताव पारित किया है और अलगाववादी नेताओं को अपनी बैठकों में आमंत्रित किया है, जिसे ये नेता कश्मीर में खूब प्रचारित भी करते हैं, ताकि लोगों को यह जता सकें कि उन्हें वैश्विक स्तर पर लोकप्रियता हासिल है. पाकिस्तान की कृपा से कश्मीरी नेताओं को ओआइसी में पर्यवेक्षक का दर्जा हासिल है.

पर इस कवायद का कुल नतीजा यह निकला कि संगठन ने भारत द्वारा कश्मीर में किये जा रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया और एक पंक्ति का निवेदन किया कि कश्मीर समस्या का समाधान निकाला जाये.

अमेरिका और उसके सहयोगियों को नाराज न करनेवालों को छोड़ कर गाजा की अंतहीन हिंसा ने हर विवेकशील व्यक्ति की चेतना को झकझोर दिया है.

कश्मीर के अलगाववादियों को भी यह अहसास हो गया है कि ओआइसी या अरब लीग से कोई उम्मीद लगाना बेकार है. कई वर्षो के बाद पहली बार विभिन्न अलगाववादी गुटों ने एक आवाज में बोलते हुए इसलामी देशों के संगठन और अरब लीग की गाजा नरसंहार पर आपराधिक चुप्पी के लिए निंदा की. उन्होंने यह भी कहा कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए इन पर निर्भर रहना अव्यावहारिक है.

इसलामी देशों के संगठन या अरब लीग द्वारा पहले के बयान पाकिस्तान प्रायोजित थे और उनका इरादा भारत को महज परेशान करना था. इसी वजह से अलगाववादी एक फर्जी उम्मीद के झांसे में फंस गये थे. उदारवादी हुर्रियत नेता मीरवाइज उमर फारूक ऐसे आखिरी नेता रहे, जिन्होंने कश्मीर के समाधान की प्रक्रिया में ओआइसी को अख्तियार दे दिया था. पर सच यह है कि अन्य रिपोर्टो की तरह इसके द्वारा पारित प्रस्तावों का भारत पर कोई असर नहीं है.

बाद में अरब नेता भारत की सरकारों को निजी तौर पर कहते थे कि उन्हें प्रस्ताव की समझ नहीं थी और वे इनके साथ सहमत नहीं हैं. सुनने में भले ही मजाक लगे, पर विदेश मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि सिर्फ पाकिस्तान व तुर्की के विदेश मंत्रियों को अंगरेजी आती थी और उनके प्रस्ताव सर्वसहमति से पारित हो जाते थे. व्यवहार में भी अरब देश कश्मीर के लिए कुछ भी नहीं करते थे.

मक्का व मदीने में विशेष प्रार्थनाओं में कुछ वर्षो के लिए कश्मीर का जिक्र होता था, अब यह भी गायब हो गया है.

उधर ईरान फिलस्तीन पर पहले भी बोलता था और अब भी बोलता है, लेकिन कश्मीर पर वह भारत को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाता. 1994 में ईरान ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो पर दबाव डाल कर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को रोक लिया था. उस समय भारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता अटल बिहारी वाजपेयी, उपनेता फारूक अब्दुल्ला व तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के प्रयासों ने भारत को बड़े कूटनीतिक संकट से उबार लिया था.

अब आंतरिक और बाहरी तौर पर पाकिस्तान भी लगातार कमजोर हो रहा है. ऐसे में कश्मीरियों को खुद ही अपना रास्ता बनाना होगा.

अमेरिका की जासूसी संस्था सीआइए के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ब्रुस रीडेल ने अपनी किताब में लिखा है कि कश्मीर समस्या भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध की स्थिति पैदा कर सकती है तथा अमेरिका जिस मसले में पड़ता है, उसे और बिगाड़ देता है. ओआइसी व अरब लीग पर अलगाववादियों के बयान ने कश्मीर पर नये सिरे से सोचने का अवसर दिया है. देर से ही सही, यह स्वागतयोग्य है.

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