रोजगार वाया आंदोलन
पीयूष पांडे... वरिष्ठ व्यंग्यकार pandeypiyush07@gmail.com वही हुआ जिसका डर था. बिना मान्यता प्राप्त विवि से प्रदर्शन-आंदोलन का कोर्स किये आंदोलनकारी सड़क पर आ गये हैं. देश का कोई नामचीन विवि उस कौशल का पाठ्यक्रम संचालित ही नहीं कर रहा, जिसकी आज अधिक आवश्यकता है. प्रदर्शन-आंदोलन का कोई प्रामाणिक कोर्स कहीं न होने से जूनियर आंदोलनकारी […]
पीयूष पांडे
वरिष्ठ व्यंग्यकार
pandeypiyush07@gmail.com
वही हुआ जिसका डर था. बिना मान्यता प्राप्त विवि से प्रदर्शन-आंदोलन का कोर्स किये आंदोलनकारी सड़क पर आ गये हैं. देश का कोई नामचीन विवि उस कौशल का पाठ्यक्रम संचालित ही नहीं कर रहा, जिसकी आज अधिक आवश्यकता है.
प्रदर्शन-आंदोलन का कोई प्रामाणिक कोर्स कहीं न होने से जूनियर आंदोलनकारी सीनियर आंदोलनकारियों के सिखाये फॉर्मूलों पर चलने को मजबूर हैं. वही धरना, वही नारेबाजी. कहीं-कहीं बस फूंकू कार्यक्रम या पत्थरबाजी.
कल्पना कीजिए कि किसी यूनिवर्सिटी में ‘मास्टर इन आंदोलन’ कोर्स होता. वहां का कोई स्वर्ण पदकधारी आंदोलनकारी आंदोलन से पहले एक पावरप्वाॅइंट प्रजेंटेशन तैयार करता.
फिर प्रोजेक्ट तैयार होता- किस रोड पर किस वक्त कितने आंदोलनकारी कितने डेसिबल में एक साथ हाय-हाय के नारे लगायेंगे. टीवी कैमरों के सामने प्रदर्शनकारी का एक अलग गुट किस तरह बिना पिटे ही पिटने के मारक दृश्य उपलब्ध करायेंगे. प्रशिक्षित आंदोलनकारियों के नेतृत्व में आंदोलन सही मायने में आंदोलन नहीं इवेंट होते. इवेंट होते तो प्रायोजक होते.
प्रायोजक होते तो पैसा होता. पैसा होता तो आंदोलनों के लिए अलग चैनल होते. आंदोलनकारियों को लक्ष्य करके विशेष विज्ञापन बनवाये जाते. लब्धप्रतिष्ठ आंदोलनकारी दिन में आंदोलन करते और रात में बतौर मॉडल विज्ञापन शूट करते. कालांतर में मॉडल आंदोलनकारियों को फिल्मों में एक्टिंग का काम भी मिल सकता था. एक्टिंग करते-करते वे राजनीति के लिए मुफीद हो जाते और राजनीति में भी अपना भविष्य संवार लेते.
आशय यह कि आंदोलन का कोर्स होता, तो आंदोलन ऐसे नहीं होते जैसे हैं. वो रोजगार की संभावनाएं पैदा करते. आंदोलन की आहट होते ही युवाओं को प्रदर्शन स्थल के बाहर पकौड़े तलने के स्टॉल उपलब्ध कराये जाने चाहिए.
कुछ आंदोलनकारी पकौड़े तलें और कुछ खायें, इससे अच्छा और क्या हो सकता है? एक हफ्ते से अधिक आंदोलन चले, तो पकौड़े के साथ पनीर वाली चाऊमीन और बर्गर-मोमोज के ठेलों को भी लाइसेंस दिया जाये. पुलिस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शनकारियों को कुछ युवा किराये पर हेलमेट देने का काम शुरू कर सकते हैं. वहीं कुछ लाइसेंसी पत्थर सप्लायर तैयार हो सकते हैं, जो पिज्जा की तर्ज पर आधा घंटे में पत्थरों की ‘होम एंड लोकेशन डिलीवरी’ करें.
ये सप्लायर आंदोलन के बाद खुद ही सड़क से पत्थर उठा सकते हैं. इस तरह नगर निगम का बोझ कुछ कम होगा. आंदोलनकारी लंबी पदयात्रा निकालें, तो उनके लिए हर शहर में ई-रिक्शा किराये पर देने का रोजगार तैयार हो सकता है.
आंदोलन से रोजगार की अनंत संभावनाएं हैं. वह जमाना और था, जब आंदोलन साल-छह महीने में कभी होते थे, इसलिए आंदोलनकारियों और आंदोलन से जुड़े युवाओं के बेकार रहने का डर होता था. अब तो हर दिन हर गली-मुहल्ले में प्रदर्शन-आंदोलन चल रहे हैं. देश में रोजगार की कमी है, तो आंदोलनों को ही रोजगार बना देना चाहिए. सिंपल!
