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Home Opinion सहजीविता का प्रतीक धुमकुड़िया

सहजीविता का प्रतीक धुमकुड़िया

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डॉ अनुज लुगुन

सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया

anujlugun@cub.ac.in

युवा पीढ़ी को हमेशा एक ऐसी जगह और अवसर की जरूरत होती है, जहां वह बिना लैंगिक भेद के एक साथ समय बिता सके और अपने सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश के बारे में चिंतन मनन करे. कथित पितृसत्तात्मक-शुद्धतावादी पारंपरिक सामाजिक मान्यताएं इस तरह का अवसर उपलब्ध नहीं कराती हैं. खासतौर पर मुख्यधारा में तो यह नहीं दिखता है. आधुनिक संवैधानिक संस्थाओं की यह जिम्मेदारी थी.

स्कूल, कॉलेज, विवि आदि संस्थाओं की जिम्मेदारी इससे अलग नहीं थी. पारंपरिक मान्यताओं और विचारों के प्रवेश ने इन संस्थाओं की प्रगतिशीलता को बाधित किया. यहां भी लैंगिक विभाजन कई स्तरों पर है. ये सारी बातें इसलिए कही जा रही हैं कि हम अपने सामाजिक बुनियाद में कितने लोकतांत्रिक हैं और अपनी युवा पीढ़ी को लोकतांत्रिक होने के लिए कितना अवसर उपलब्ध करा रहे हैं? अाज बाजार के सिवाय शायद ही ऐसी कोई जगह युवाओं के लिए मौजूद है.

पिछले सप्ताह ही रांची में आदिवासी समाज के युवाओं ने धुमकुड़िया- 2019 का राष्ट्रीय आयोजन किया था. आयोजन में शामिल होने के बाद उपर्युक्त सवाल मेरे लिए फिर से सामने आया. यह आयोजन आदिवासियों की सामाजिक संस्था ‘धुमकुड़िया’ के पुनर्स्मरण की तरह था.

आदिवासी समाज की सामाजिक संस्थाओं एवं उनकी ज्ञान परंपरा के बारे में कम ही बातें सामने आती हैं. आकादमिक संस्थाओं से लेकर नीति निर्मात्री संस्थाओं में भी शायद ही कभी इस पर विचार किया जाता है. लेकिन ये संस्थाएं लोकतांत्रिक मूल्यों के पुनर्विश्लेषण और देशज विशिष्टताओं के लिए महत्व रखती हैं. ये संस्थाएं विभिन्न आदिवासी समुदायों में विभिन्न नामों से अस्तित्व में रही हैं.

जैसे ‘धुमकुड़िया’ का उरांव समुदाय से, ‘घोटुल’ का मुरिया समुदाय से और ‘गीति:ओड़ा:’ का मुंडा समुदाय से संबंध रहा है. इन्हें समाजशास्त्रियों ने ‘युवागृह’ का नाम दिया है. इस तरह के युवागृह की सांस्कृतिक विशिष्टता को समझने के बजाय इसके बारे में कई अफवाहें भी समाजशास्त्रियों के बीच प्रचलित रही हैं. ये संस्थाएं न केवल आदिवासी समाज की जीवनशैली और ज्ञान परंपरा को संचालित करती रही हैं, बल्कि उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष में इनकी बड़ी भूमिका भी रही है. कथाकार पीटर पॉल एक्का के उपन्यास ‘जंगल के गीत’ की कथावस्तु ‘धुमकुड़िया’ पर ही केंद्रित है. यह उपन्यास बिरसा मुंडा के उलगुलान का दूसरे आदिवासी समुदायों पर पड़े प्रभाव की कथा कहता है.

‘धुमकुड़िया’ जैसी संस्थाएं आदिवासी समाज के लोकतांत्रिक होने की सूचक हैं. ये आदिवासी युवाओं के लिए लोकतंत्र के प्रशिक्षण और अभ्यास का प्रतीक हैं.

हर गांव में ‘धुमकुड़िया’ हुआ करता था. यहां अविवाहित आदिवासी युवक-युवती सामाजिक-सांस्कृतिक क्रियाओं का अभ्यास करते थे. युवक-युवती दोनों पक्षों के प्रतिनिधि चुने जाते थे. आपस में परिचर्चा और संवाद जारी रहता था, जो आगे चल कर सामाजिक दायित्व के ग्रहण में रूपांतरित हो जाता था. संगीत इसका मुख्य आधार होता था, जिसे आदिवासी सामाजिकता और सहजीविता कहा जाता है, उसके मूल में इसी तरह की संस्थाओं का विचार है.

यह आदिवासी समाज की ऐसी सांस्कृतिक विशेषता रही है, जो गैर-आदिवासी समाज में नहीं मिलती है. संविधान निर्माण के दौरान जब विभिन्न सामाजिक समूहों के हितों की चिंता की जा रही थी, तब आदिवासी समाज की इसी सांस्कृतिक विशेषता को देखते हए ही उसके लिए पांचवीं एवं छठी अनुसूची की व्यवस्था की गयी. जयपाल सिंह मुंडा इस विचार के सबसे बड़े वक्ता थे. नेहरू ने भी इस विशेषता को स्वीकृति दी थी.

लेकिन आजादी के बाद आदिवासी क्षेत्रों के प्रति जो उपेक्षा का रवैया रहा, उसने उसके अंदर की सांस्कृतिक विशेषताओं को न केवल उभरने नहीं दिया, बल्कि विकास की बड़ी परियोजनाओं, विस्थापन, पलायन आदि की वजह से उसे खुले आम कुचला गया. बाहरी दिकू संस्कृति के अतिक्रमण ने इसे और धक्का पहुंचाया. अब व्यवहार में ‘धुमकुड़िया’ जैसी संस्थाएं नहीं दिखती हैं.

यहां ‘धुमकुड़िया’ का आयोजन पिछले कई वर्षों से हो रहा है. यह महज कोई मनोरंजन का अनुष्ठान नहीं है, बल्कि इसके प्रति युवाओं में गहरा सामाजिक और सांस्कृतिक बोध है. ‘धुमकुड़िया -2019’ के आयोजन में भी विभिन्न क्षेत्रों से आये आदिवासी युवक-युवती शामिल थे.

उनमें से कई तो इस कार्यक्रम के लिए ही विदेशों की अपनी पढ़ाई और नौकरी से छुट्टी लेकर आये थे. शिक्षा, मेडिकल, विधि, तकनीक, प्रबंधन, राजनीति, साहित्य, कला, संगीत जैसे विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व कर रहे युवा आदिवासी समाज की उपस्थिति भविष्य का चेहरा प्रस्तुत कर रही थी. जहां इनमें अपने विस्मृत इतिहास से जुड़ने की बेचैनी है, वहीं वर्तमान की समस्याओं के प्रति चिंता और सजगता भी.

झारखंड जैसे आदिवासी बहुल प्रांत में यदि ऐसी सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषता को संवैधानिक व्यवस्था के जरिये आगे बढ़ाया जाये, तो सहज ही लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा दिया जा सकता है. पांचवीं एवं छठी अनुसूची के सही क्रियान्वयन द्वारा यह संभव है.

क्या इस ‘धुमकुड़िया’ का विस्तार आदिवासी प्रांतों से बाहर नहीं किया जा सकता है? लैंगिक भेद को खत्म करने और लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती के लिए क्या इस तरह की संस्थाओं के द्वारा समाज की युवा पीढ़ी को आपस में संवाद करने का अवसर नहीं दिया जा सकता है?

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