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अथ प्याज-कथा

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सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
drsureshkant@gmail.com
पुरानी कहानियों का गरीब आदमी अकसर ब्राह्मण होता आया है और कहानियां अकसर शुरू ही इस वाक्य से होती रही हैं कि एक गरीब ब्राह्मण था, मानो ब्राह्मण का गरीब होना ही सबसे बड़ा मुद्दा हो और सब लोगों का कर्तव्य हो कि ब्राह्मण की गरीबी दूर करें और यह भी कि अगर वह ब्राह्मण गरीब न होता, तो कोई कहानी भी न होती.
पर हमारी कहानी का गरीब सिर्फ आदमी था. देश में उस समय कोई कल्याणकारी सरकार नहीं थी, जो लोगों की गरीबी दूर करने के बारे में सोचती, भले ही गरीबी दूर करने के बारे में कुछ न करती. पकौड़े बेचने जैसे रोजगार भी तब उपलब्ध नहीं थे, क्योंकि लोग ऐसी चीजें या तो खाते ही नहीं थे या घर में ही बना-खा लिया करते थे. मजबूरन वह गरीब काम की तलाश में परदेस गया.
परदेस उस समय अपने देश में ही हो जाता था और उसके लिए विदेश जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. गांव से बाहर निकलते ही आदमी को परदेस लगने लगता था. यह जरूर था कि आज जैसे वाहन न होने के कारण उतनी दूर जाने में भी आदमी को कई दिन लग जाते थे. पैर, और वह भी अपने ही, उस समय परिवहन का सबसे प्रचलित साधन थे.
परदेस जाकर गरीब आदमी ने देखा कि वहां के लोग खाने में प्याज से परिचित नहीं हैं. गरीब आदमी ने सोचा कि क्यों न अपने यहां से प्याज लाकर यहां के लोगों को बेचा जाये. यह सोच कर वह वापस आने गांव लौटा और एक बैलगाड़ी में प्याज भरवा कर परदेस पहुंच गया तथा सीधे राजा के यहां जाकर गुहार लगायी कि वह अपने साथ एक ऐसी खाने की चीज लाया है, जिसे उन्होंने और उनकी प्रजा ने आज तक नहीं चखा होगा और जिसे खाकर उन्हें बहुत आनंद आयेगा.
राजा हैरान रह गया कि ऐसी कौन-सी चीज हो सकती है, जो राजा होकर भी हमने न खायी हो? कुछ सोचकर उसने गरीब से कहा कि अगर तुम्हारी बात सच निकली, तो हम तुम्हें अपने यहां की सबसे कीमती चीज भेंट में देंगे, लेकिन अगर ठीक न निकली, तो तुम्हें कोल्हू में पिरवा दिया जायेगा. मृत्युदंड देने का सबसे पसंदीदा तरीका उस समय कोल्हू में पिरवाना ही था और बहुत-से कोल्हू गन्ने पेरने के बजाय इसी काम आते थे.
राजा की शर्त स्वीकार करते हुए गरीब ने प्याज से भरी बैलगाड़ी राजा के रसोइए के हवाले कर दी और उसके इस्तेमाल का तरीका भी बता दिया. सब्जी और सलाद में प्याज का स्वाद राजा को बहुत भाया और अपने वादे से न मुकरते हुए उसने उतना ही सोना बैलगाड़ी में भरवा कर गरीब आदमी को, जो कि अब गरीब नहीं रहा था, देते हुए बाइज्जत विदा किया.
आगे कहानी इतनी-सी है कि जब वहां के लोग प्याज खाने के अभ्यस्त हो गये, तो जमाखोर हर साल प्याज की जमाखोरी करके लोगों को लूटने लगे. राजा और उसके मंत्री भी यह कह कर अप्रत्यक्ष रूप से इसमें सहयोग करने लगे कि हमारे हाथ में कुछ नहीं है. यहां आकर कहानी आपको अपनी-सी लगने लगे, तो इसमें न तो इस खाकसार का कोई कसूर है, न राजा और उसके मंत्रियों का और न ही प्याज का.
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