[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home Opinion कमजोर होती अर्थव्यवस्था

कमजोर होती अर्थव्यवस्था

0

उत्पादन, मांग और निर्यात में कमी तथा मुद्रास्फीति बढ़ने के साथ रोजगार की लचर होती स्थिति से अर्थव्यवस्था से संबंधित चिंताएं गंभीर होती जा रही हैं. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, नोमुरा होल्डिंग्स और कैपिटल इकोनॉमिक्स से जुड़े अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि पिछली तिमाही (जुलाई से सितंबर) में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 4.2 से 4.7 के बीच रही है.

आधिकारिक रूप से सरकार 29 नवंबर को आंकड़े जारी करेगी. चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल से जून) में बढ़त की रफ्तार पांच फीसदी रही थी. बहरहाल, संतोष की बात है कि गिरावट के बावजूद जी-20 के सदस्य देशों में सबसे तेज वृद्धि दर भारत की है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पूर्ववर्ती अनुमान को कम करने के बावजूद उम्मीद जाहिर की है कि मौजूदा वित्त वर्ष में भारत की वृद्धि दर बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के इस समूह में सर्वाधिक रहेगी.

लेकिन इतने भर से आगामी आशंकाओं और चुनौतियों को लेकर निश्चिंत नहीं रहा जा सकता है. आर्थिकी को गति देने के लिए सरकार और रिजर्व बैंक ने पिछले दिनों लगातार प्रयास किये हैं. इस साल रिजर्व बैंक ने पांच बार ब्याज दरों में कटौती की है. अगस्त से लेकर अब तक वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अनेक वित्तीय पहलकदमी की है. हाल ही में उन्होंने सही ही कहा है कि घरेलू उद्योगों के लिए निर्धारित 15 फीसदी का कॉर्पोरेट कर दक्षिण-पूर्वी एशिया के कई देशों से कम है. सरकार को नये निवेशों की उम्मीद है, जिससे रोजगार और आमदनी बढ़ाने में मदद मिल सकती है तथा कुछ समय के बाद अधिक राजस्व संग्रहण भी हो सकता है.

जानकारों का अनुमान है कि दिसंबर में रिजर्व बैंक ब्याज दरों में फिर कटौती कर सकता है. केंद्रीय बैंक और सरकार की ओर से बैंकों से लगातार कहा जाता रहा है कि दरों में कमी का फायदा आम ग्राहकों को मिलना चाहिए ताकि मांग और नगदी का प्रवाह में बढ़ोतरी हो. इस साल बजट के बाद की घोषणाओं के असर की समीक्षा की जरूरत भी है. सरकार का कहना ठीक है कि नतीजों के आने में देरी हो सकती है, पर यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सुधार सही और समुचित हैं.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पिछले कुछ सालों से नीतियों और नियमों के स्तर कई अहम फैसले हुए हैं, परंतु जरूरत के मुताबिक सरकार को बड़े सुधारों को लागू करने में परहेज नहीं करना चाहिए. घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल के माहौल में जरूरी कदम उठाने में देरी या हिचकिचाहट से मुश्किलें पैदा हो सकती हैं.

सालभर में वृद्धि दर के आठ से पांच फीसदी आ जाने की कमी की समस्या को क्षणिक गिरावट या तात्कालिक कारकों का परिणाम कहकर दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए. बैंकों पर फंसे हुए कर्ज का दबाव, औद्योगिक उत्पादन में गिरावट और मांग का लगातार घटते जाने जैसे कारकों से छूटकारा पाने के लिए दीर्घकालिक रणनीति अपनाने की दरकार है. ऐसा नहीं करने से अगले एक-दो सालों में बेहतरी की उम्मीदें पूरी नहीं हो सकेंगी.

ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel