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रिक्तता में समग्रता

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कविता विकास

लेखिका

kavitavikas28@gmail.com

महापर्वों का सिलसिला अब कुछ महीनों के लिए थम गया. उत्साह-उमंग और हंसी-खुशी से इन पर्वों में शिरकत करनेवाले अब पुनः अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गये हैं. मन आह्लादित होता रहे, इसके लिए किसी ना किसी उत्सव में खुद को जोड़े रखना चाहिए. उत्सव का तात्पर्य किसी त्योहार से ही नहीं, बल्कि घर-परिवार, समाज या कार्यक्षेत्र में होनेवाले सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों से भी है. ऐसे उत्सव जीवन की एकरसता को दूर करने में मदद करते हैं.

थका हुआ मन हमें उदासीन बना देता है. हम अक्सर अपने आप को दोष देने लगते हैं. मनोवैज्ञानिक तो यह बताते हैं कि इस हालत में उनसे जुड़िये जो शारीरिक – मानसिक स्तर पर आपसे कमजोर हैं. ऐसे लोग किसी भी सुविधा के गुलाम नहीं हैं. अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करते हुए स्वयं को न तो अपने से बेहतर वालों से तुलना करके उदास होते हैं और न किसी विशेष सुविधा की अपेक्षा में परेशान होते रहते हैं.

इन दिनों कोहरे के झरोखों से जागती अलसाई सुबह में मैं देखती हूं कि विशाल हरसिंगार के पेड़ से झड़कर श्वेत पुष्प जमीन पर पड़े हुए हैं.

इन्हीं फूलों से आशुतोष शिव के जटाजूट का शृंगार होता है, इसलिए इन्हें शिवली भी कहा जाता है. कुछ और दूर तक नजर जाती है, तो देखती हूं कि कस्बे के किनारे की खाली जगह पर कांस के फूल खिले हुए हैं, मानो शरद की अगुवाई में सफेद गलीचा बिछा हुआ हो. शरदोत्सव आनेवाला है, उसकी धीमी-धीमी पदचाप सुनायी भी देने लगी है.

आजकल तो हम बहुत मशगूल हो गये हैं अपने-आप में, अपनी दिनचर्या में और जिंदगी की जद्दोजहद में. अपना कोई प्रिय त्योहार या मौसम कब आया और कब गया, इसकी सूचना हमें तब मिलती है, जब उससे जुड़ी कोई असाधारण घटना घट जाती है. ध्यान रखना चाहिए कि प्रकृति के सौंदर्य-बोध से जीवन का दर्शन जुड़ा हुआ है.

कितना अद्भुत नजारा होता है शरद के आगमन का. तिमिर के भाल को अपनी किरणों से सजाने क्षितिज के पार से दिवामणि इठलाता आता है.

ओस से भीगी वसुधा को अपनी ऊष्मा के पुलक स्पर्श से रोमांचित करने के लिए शनैः-शनैः चहुं दिशाओं में मंडराता है. शरद का तिलस्म क्यारियों में बहार बनकर छाने लगता है. चहुं ओर अनोखी छटा है, मगर इन सबसे बेखबर मनुष्य को उनसे जुड़ी सुंदरता को जीने की कोई लालसा ही नहीं है. हम यंत्र मानव गमले में लगे कैक्टस हैं, जिन्होंने अपने यत्र-तत्र कंटीली झाड़ियों की बाड़ उगा रखी है. भला ऐसे में ऋतुओं की मधुर आहट कैसे सुनायी देगी?

शरद भी हमारे मन के चौखट पर ठिठक गया है. गगनचुंबी इमारत के कबूतरखाने जैसे फ्लैट की गजभर बालकनी में शरद की फुहार बन छिटकी गुनगुनी धूप में खड़े होकर देखो शायद मन पर जमी बर्फ पिघल जाये और तब चौखट पर ठिठका शरद अंदर प्रवेश कर जायेगा. जिस दिन शरद को हम आत्मसात कर लेंगे, जीवन जीने की कला आ जायेगी. जीवन की रिक्तता में भी समग्रता आ जायेगी.

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