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पाकिस्तान की फितरत

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भारतीय विदेश मंत्रालय ने सही कहा है कि पाकिस्तान को भारत के अंदरूनी मामलों पर टीका-टिप्पणी करने की बेमानी आदत हो गयी है. हमारे देश की सबसे बड़ी अदालत से अयोध्या मसले पर फैसला आने के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा था कि करतारपुर गलियारे के उद्घाटन के खुशनुमा मौके पर ऐसा करना बेहद दुखद और असंवेदनशील है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि दोनों देशों की सीमाओं पर करतारपुर गलियारे होकर पवित्र गुरुद्वारे में अरदास करने का बंदोबस्त एक शानदार और सराहनीय पहल है, लेकिन इसे अयोध्या मसले से जोड़ कर देखने का कोई तुक नहीं है. यह मसला एक दीवानी मुकदमा था और सभी संबद्ध पक्षों की बातों को सुनने के बाद अदालत ने इसका निबटारा किया है. फैसला कब देना है और कैसे देना है, यह तय करने का अधिकार अदालत का है. इसमें कहीं दूर-दूर तक पाकिस्तान से कोई लेना-देना हैं.
भारतीय अदालत या संसद या सरकार का देश के मसलों पर क्या रुख और रवैया है या होगा या होना चाहिए, यह हमारे देश का आपसी विषय है. जब पाकिस्तानी विदेश मंत्री गैर जिम्मेदाराना बयान दे रहे है, उस समय उनकी सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री इमरान खान करतारपुर गलियारे पर आयोजित समारोह में कश्मीर का मुद्दा उठा रहे थे.
इसके ठीक उलट भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भारतीय तीर्थयात्रियों की भावनाओं को समझने और उनका आदर करते हुए करतारपुर गलियारे की शुरुआत करने के लिए धन्यवाद दिया है. जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है, यह अवसर दोनों देशों के भविष्य का एक स्वर्णिम पन्ना है, परंतु अपनी फितरत से लाचार पाकिस्तानी नेतृत्व ने नफरत और तनातनी बढ़ाने के इरादे का ही इजहार किया है.
पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने एक साक्षात्कार में यह अफसोस भी जताया है कि सीमा पर हो रही पहल के बावजूद दोनों देशों के बीच किसी तरह का संपर्क नहीं है. निश्चित रूप से भारत और पाकिस्तान के रिश्ते बहुत खराब दौर से गुजर रहे हैं. अब सवाल उठता है कि ऐसा होने के पीछे वजह क्या है. यदि पाकिस्तान अपने गिरेबान में झांकने की जहमत उठाये, तो इसका जवाब तुरंत मिल जायेगा.
भारत को अस्थिर करने और आतंक के जरिये तबाही फैलाने की उसकी कोशिश कई दशकों से जारी है. यह जगजाहिर है कि भारत में अलगाववाद और आतंकवाद को बढ़ावा देना उसकी विदेश और रक्षा नीति का हिस्सा है. अनेक आतंकी हमलों की साजिश रचनेवाले और उन्हें अंजाम देनेवाले अनेक गिरोह और सरगना पाकिस्तान की धरती पर सक्रिय हैं और उनके सिर पर सरकार और सेना का हाथ है.
जम्मू-कश्मीर सीमा पर युद्ध-विराम के उल्लंघन और रिहाइशी बस्तियों पर गोलाबारी करने की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं. कश्मीर में अमन-चैन बहाल करने की कोशिशों को चोट पहुंचाने के लिए प्रशिक्षित आतंकियों की घुसपैठ कराने के प्रयास हो रहे हैं. अगर पाकिस्तान की यही आदत और फितरत जारी रही, तो उसके साथ सक्रिय संपर्क या बातचीत की गुंजाइश कैसे हो सकती है!
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