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Home Opinion भारत-सऊदी रिश्ते के आयाम

भारत-सऊदी रिश्ते के आयाम

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पुष्पेश पंत
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
pushpeshpant@gmail.com
इस घड़ी मोदी के विपक्षी आलोचक उन पर अल्पसंख्यक यानी मुसलमानों के उत्पीड़न का आरोप लगा रहे हैं, ठीक उसी वक्त मोदी अपनी नीतियों के लिए प्रमुख इस्लामी देश का समर्थन जुटाने में कामयाब रहे हैं.
हाल का प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा तब संपन्न हुआ, जब यूरोपीय समुदाय के सांसदों के कश्मीर-दौरे ने बहस को गरमाया था. मोदी सरकार को इस बात के लिए कठघरे में खड़ा किया जा रहा था कि इस प्रतिनिधिमंडल के अधिकांश सांसद इस्लामद्वेशी हैं. इसी समय मोदी ने सऊदी अरब का बेहिचक समर्थन जुटा कर इस गुब्बारे की हवा निकाल दी.
सऊदी नेताओं ने भले ही पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, पर इस बात को दोहराया कि किसी को भी दूसरे देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने या उसकी संप्रभुता को संकटग्रस्त नहीं करने दिया जा सकता.
यह बात भी रेखांकित की गयी कि संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बना जम्मू-कश्मीर की स्थिति में प्रशासनिक परिवर्तन भारत का आंतरिक मामला है. इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि अपने राष्ट्रहित में सऊदी अरब ने इस्लामी धर्मराज्य पाकिस्तान पर धर्मनिरपेक्ष भारत को तरजीह दी है, वह भी तब, जब भारत में हिंदुत्व को बढ़ावा देनेवाली अतिराष्ट्रवादी पार्टी का राज है!
सऊदी अरब इस बात से बेखबर नहीं कि पाकिस्तान न केवल दिवालिया राज्य है, वरन कट्टरपंथी दहशतगर्दों का अभयारण्य भी है. अल-कायदा हो या आइएसआइएस, यह अरब भूभाग में ही नहीं समूचे इस्लामी जगत में सऊदी नेतृत्व को ही सबसे पहले चुनौती देते हैं. आरंभ में इनका जन्म भले ही सऊदी वहाबी संप्रदाय से प्रेरित रहा हो, आज ये बेलगाम हैं. इन्हीं के बर्बर आचरण ने इस्लाम को बदनाम किया है और इसी आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष ने मध्य-पूर्व और तेल की राजनीति को अस्थिर किया है. इसका बड़ा नुकसान सऊदी अरब को हुआ है.
पाकिस्तान की तुलना में भारत कहीं आकर्षक मित्र है. इंडोनेशिया के बाद विश्वभर में मुसलमानों की सबसे बड़ी आबादी भारत में बसती है.
इनमें काफी बड़ी संख्या में कुशल कारीगर, श्रमिक, डॉक्टर इंजीनियर सऊदी अरब में रोजी-रोटी कमाते रहे हैं. भारत से हज पर जानेवाले तीर्थयात्रियों की संख्या भी कम नहीं. मोदी के प्रयासों से इस संख्या को बढ़ाने के लिए भी सऊदी राजी हो गया है. बहुत कम समय के अंतराल में सऊदी अरब की यात्रा कर मोदी यह दर्शाते रहे हैं कि भारतीय विदेश नीति की प्राथमिकता सूची में इस देश का स्थान कितना ऊपर है.
इस बात का श्रेय सऊदी अरब के युवराज मुहम्मद बिन सलमान को भी दिया जाना चाहिए कि उन्होंने भारत की राजनयिक संवेदनशीलता को स्वीकार किया है और तद्नुसार अपनी नीति को हमारे अनुकूल बनाया है. अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाये प्रतिबंधों के कारण भारत को उस देश से तेल आयात में कटौती करनी पडी. सऊदी ने यह आश्वासन देने में देर नहीं लगायी कि वह हमारी ऊर्जा सुरक्षा को निरापद रखने के लिए आपूर्ति में कोई अड़चन नहीं आने देगा. इसके बाद ही बहुआयामी सहकार का माहौल आसानी से तैयार हुआ.
अगले पांच वर्षों में एक खरब डॉलर का निवेश तेल-ऊर्जा क्षेत्र में करने का इरादा है. सऊदी अरब पहले ही भारत के पश्चिमी तट पर भीमकाय तेल शोधक कारखाने में एक खरब डॉलर के निवेश का ऐलान कर चुका है. मुकेश अंबानी के तेल गैस कारोबार वाली कंपनी के 25 प्रतिशत शेयर सऊदी अरब की अरामको कंपनी खरीद चुकी है. जाहिर है कि आनेवाले समय में ऊर्जा क्षेत्र में भारत और सऊदी के सामरिक सहयोग की मजबूत नींव रखने में मोदी का सक्रिय राजनय सफल रहेगा.
सऊदी अरब आज अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत का चौथा सबसे बड़ा साझेदार है. उसकी यह हस्ती वहां से तेल के आयात के कारण ही बरकरार है.
आज तेल के निर्यात पर सऊदी शासक अपनी निर्भरता घटाना चाहते हैं और अमेरिका को भी ट्रंप के सत्ता ग्रहण करने के बाद बहुत भरोसेमंद नहीं समझते. उनकी यह आशंका नाजायज नहीं कि ईसाइयत और इस्लाम की सभ्यताओं की भिड़ंत में अमेरिका का दीर्घ कालीन बैर मुसलमानों के साथ जारी रहेगा. अमेरिका ही नहीं, यूरोप भी उस बीमारी का शिकार है, जिसे ‘इस्लामोफोबिया’ कहते हैं. यह सुझाना भी तर्कसंगत है कि मोदी के राजनय की बड़ी उपलब्धि सऊदी अरब के साथ उभयपक्षीय संबंधों को तेजी से घनिष्ठ बनाना है. दिलचस्प यह है कि उन्होंने बिना इस्राइल के साथ भारत के सामरिक रिश्तों को धुंधलाये ऐसा कर दिखाया है.
इस दौरे में सऊदी अरब तथा भारत ने एक महत्वपूर्ण सामरिक परिषद की स्थापना की घोषणा की है, जो रक्षा मामलों में सहकार को बढ़ायेगी. साथ ही, सूचना तकनीकी तथा वैकल्पिक ऊर्जा के विकास में महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का सूत्रपात हुआ है.
हमारी समझ में सबसे अहम था भविष्य में निवेश की पहल (फ्यूचर इन्वेस्टमेंट इनीशिएटिव) नामक ‘रेगिस्तान में डावोस’ सरीखे मंच का उद्घाटन. नरेंद्र मोदी ने बिना समय गंवाये इसका उपयोग संयुक्त राष्ट्र की दो टूक आलोचना के लिए किया.
उन्होंने यह कहा कि इस संस्था ने हमें निराश ही किया है. इस पर बड़ी ताकतों का कब्जा है और इसी कारण यह तटस्थ मध्यस्थ की भूमिका नहीं निभा पाता. इसमें संरचनात्मक सुधारों की जरूरत है. याद रहे, यह बात तब कही गयी, जब संयुक्त राष्ट्र कश्मीर में प्रशासनिक परिवर्तन के बाद मानवाधिकारों के उल्लंघन के बारे में चिंता मुखर कर भारत को यथाशीघ्र हालात सामान्य बनाने की सलाह दे चुका है.
हास्यास्पद बात यह है कि अमेरिका या चीन हो, पाकिस्तान या उत्तरी कोरिया हो, इनके द्वारा मानवाधिकारों के हनन पर संयुक्त राष्ट्र की चुप्पी दोहरे मानदंडों को जगजाहिर करती रही है. संयुक्त राष्ट्र खुद दिवालिया है और भारत उन गिने-चुने सदस्य देशों में है, जिसके अंशदान से इसका अंतरिम खर्च पूरा हो पा रहा है.
भारतीय प्रधानमंत्री ने इस संस्था को आईना दिखाने के लिए यह मंच इसलिए चुना है, क्योंकि चीन की मदद से कश्मीर विवाद के अंतरराष्ट्रीयकरण का प्रयास यहीं किया जाता रहा है. निश्चय ही नये सऊदी मित्रों की सहमति के अभाव में ऐसा वक्तव्य नहीं दिया जाता.
जो बात स्पष्ट है, वह यह कि मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में भारत को दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय चौखट से निकाल कर अपने राजनयिक प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने को उद्यत है.
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