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Home Opinion लालच की राजनीति से दूर रहते थे कार्तिक उरांव

लालच की राजनीति से दूर रहते थे कार्तिक उरांव

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महादेव टोप्पो

लेखक

mahadevtoppo@gmail.com

दुनिया में शायद ही कोई ऐसी महान हस्ती हो, जिसकी आलोचना न की गयी हो. समाज में कई बार महान लोगों का महत्व पहचान लिया जाता है या कई बार लोगों को समझने में दिक्कत होती है. झारखंड में मेनस ओड़ेया, जूलियस तिग्गा, इग्नेस कुजूर, जयपाल सिंह, कार्तिक उरांव, रामदयाल मुंडा आदि कुछ हस्ती हैं- जिनके कामों, उपलब्धियों, योजनाओं, सपनों आदि का मूल्यांकन नहीं किया गया है.

इसका एक कारण तो स्वयं उसी के समुदाय के लोगों द्वारा अनजाने में की गयी उपेक्षा भी है. दरअसल, उनके नायकों का अन्य समुदायों द्वारा कभी नकारात्मक टिप्पणी करने या उनमें गलत धारणा के बन जाने से समाज-विशेष इसका प्रतिकार करने में कमजोर हो जाता है, फलतः वर्चस्वशाली व वाचाल लोग इसे अपनी दिशा में मोड़ लेते हैं. कई बार तो उनकी नकारात्मक छवि गढ़ दी जाती है.

झारखंड में कई शख्शियतें ऐसी हैं, जिनके बारे में स्थानीय मीडिया या बौद्धिक जगत में चर्चा कम होती है. परिणामतः वे अंधरे व गुमनामी के गर्त में भुलाये जाने के लिए धकेल दिये जाते हैं. हालांकि, अब लोग अपने इतिहास पुरुषों को समझने का प्रयास करने लगे हैं, जैसा कि पिछले पांच-सात सालों में जयपाल सिंह के बारे में कुछ किताबें प्रकाशित होने से साबित होता है.

इन लोगों के कामों के बारे में प्रकाशित सामग्री के अभाव के साथ उनके कार्यों के प्रति झारखंड के विश्वविद्यालयों में शोध कार्य किये जा सकते थे, लेकिन ऐसा कम ही हुआ है. झारखंडी व आदिवासी बुद्धिजीवी प्रायः ऐसे मामलों में निष्क्रिय या उदासीन भी दिखते हैं और अपने नायकों के प्रति उनके मन में सम्मान रहते हुए भी उनके महत्वपूर्ण कार्यों या उपलब्धियों के बारे में कम जानते हैं. ऐसी ही एक शख्सियत हैं- कार्तिक उरांव.

गुमला के लिटा टोली गांव में 29 अक्तूबर, 1924 को जन्मे कार्तिक उरांव झारखंड के आदिवासियों के मसीहा थे. राजनीति में आने के पहले उरांव विरल इंजीनियरों में एक थे. उन्होंने लंदन में रहकर इंजीनियरिंग में एमएससी की थी और पांच अन्य महत्वपूर्ण डिग्रियां भी हासिल की. उस समय वे भारत में गिने-चुने, कुछ बड़े इंजीनियरों में से एक थे.

नेहरू से प्रेरित होकर वे राजनीति में आये. उन्होंने सोशल इंजीनियरिंग का सपना देखा, जिससे पता चलता है कि आदिवासी समाज के शोषण और उत्थान का सुझाव देते उन्होंने- धर्म एवं संस्कृति, भाषा, शिक्षा, संगठन, आर्थिक विकास और नशा का त्याग पर- काम करने पर बल दिया था. इसके लिए वे आजीवन प्रयासरत रहे.

उनके सहयोगी रहे नरेंद्र भगत जी बताते हैं- ‘रांची में सरहुल जुलूस, हातमा से सिरोमटोली तक जुलूस निकाले जाने की परंपरा की शुरुआत उन्होंने ही 1967-68 में की थी.’ उन्होंने आदिवासी समुदाय के सामाजिक संगठन ‘पड़हा’ को पुनर्संगठित किया था और ‘पड़हा’ नामक पत्रिका का संपादन-प्रकाशन भी किया.

उन्होंने आदिवासियों को देशभर में जोड़ने के लिए ‘अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद्’ का गठन किया था. इसके राष्ट्रीय सम्मेलनों से- आदिवासियों को एकजुट करके अपनी समस्याओं को समझने के लिए उनमें जागरूकता लाने का काम किया. सन् 1981 में दिल्ली में आयोजित आदिवासी विकास परिषद् का महाधिवेशन एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयोजन था. लेकिन, विकास परिषद् को एकजुट होकर पूरे भारत में सर्वांगीण विकास के लिए उन्होंने जिस तरह से संगठित करना चाहा, वह उतना प्रभावशाली नहीं हो सका.

फलतः आदिवासी विकास परिषद् देश के कई स्थानों में कुछ सभा या जलसा करने तक सीमित रह गया है, लेकिन कई स्थानों में यह आज भी सक्रिय भूमिका में है. उनका एक सपना था कि आदिवासियों को हर तरह की शिक्षा एक छत के नीचे उपलब्ध हो. इसके लिए वे तत्कालीन मध्य प्रदेश, ओडिशा व बिहार के तिमुहाने पर ‘शक्ति शिक्षा निकेतन’ का निर्माण करना चाह रहे थे.

उन्होंने बिरसा कृषि विवि, ट्राइबल सब प्लान आदि के गठन व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. मुख्यधारा की चकाचौंध राजनीति में रहते हुए भी वे लालच से दूर रहे. वर्ष 1977 में वे दिल्ली में गंभीर रूप से अस्वस्थ हुए, तो इलाज के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे. तब गुमला से कई लोगों ने उन्हें पांच-पांच रुपये का मनीऑर्डर भेजा था.

लोग कार्तिक के कामों को याद करते हैं, लेकिन झारखंड इंडीजीनस पीपल्स फोरम ने कार्तिक उरांव के नाम से इंजीनियरिंग, साइंस या टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करनेवाले युवा आदिवासी को कार्तिक उरांव पुरस्कार देने का निर्णय लिया है.

गुमला में उनके नाम से कॉलेज है. लेकिन हम कार्तिक, जयपाल, रामदयाल या अन्य इतिहास-पुरुषों की खूबियों और कभी उनकी कमियों, दोनों से सबक लें, तो समाज व देश दोनों के लिए बहुत नेक काम कर सकते हैं.

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