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Home Opinion हिमालय से हिंद महासागर तक संघर्ष

हिमालय से हिंद महासागर तक संघर्ष

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प्रो सतीश कुमार

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार

singhsatis@gmail.com

भारत और चीन के बीच अनौपचारिक वार्ता एक नये संबंध का आगाज बन सकता है. प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति सफल होती हुई दिखाई देती है. इस वार्ता में कश्मीर के मसले को नहीं उठाया गया. बातचीत व्यापार और सीमा विवाद पर टिका रहा. महाबलीपुरम की वार्ता मोदी के कारगर और सशक्त कूटनीति का हिस्सा है.

दुनिया की राजनीति में भारत और चीन दो सबसे बड़े देश हैं. चीन के राष्ट्रपति ने कहा कि सीमा विवाद भारत-चीन के बीच सीमा विवाद का ऐसा हल निकालेंगे, जो दोनों पक्षों को मंजूर होगा. व्यापार और निवेश संबंधी भारत की चिंताओं को दूर करने कि लिए चीन ने एक नया तंत्र स्थापित करने की बात कही है.

भारत ने अपनी कारगर कूटनीति के जरिये चीन के सामने कई सामरिक मुसीबतों को खड़ा कर दिया है. अभी तक चीन पहल करता था और भारत उसकी हठधर्मिता को मानने के लिए बाध्य होता था. अब ऐसी बात नहीं रही.

आज भारत की सामरिक योजनाएं चीन के लिए चुनौती बनती जा रही हैं. उसमें एक चुनौती हर्ष की है. हर्ष का अर्थ है- हिमालयन हिंद महासागर राष्ट्रीय समूह. यानी हिमालय के तटवर्तीय देशों की एक शृंखला हिंद महासागर से जुड़ती है, जिसमें करीब 54 देश शामिल हैं.

इसका भौगोलिक स्वरूप तिब्बत से लेकर अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक फैला हुआ है. उन सभी देशों की आबादी और आर्थिक संसाधन दुनिया की आधी आबादी से भी अधिक है. इसमें तमाम ऐसे देश हैं, जिनकी आर्थिक विकास दर बेहतर है.

महाबलीपुरम में चीन और भारत के प्रधानमंत्री के बीच लंबी अनौपचारिक वार्ता हुई. दोनों देशों के पास शिकायतों की पोटली है, लेकिन भारत शुरू से ही चीन के हितों का हिमायती रहा है. दोनों देशों के बीच संघर्ष के कारण अलग-अलग हैं.

तकरीबन 3,380 किलोमीटर की लंबी सीमा रेखा का विवाद गले की हड्डी बना हुआ है. चीन सीमा विवाद को लेकर पैकेज डील की बात करता है. दूसरा मुख्‍य मुद्दा तिब्बत को लेकर है. वर्तमान में चीन ने अपनी पसंद के दलाई लामा का चयन किया है और भारत से उम्मीद कर रहा है कि भारत उस पर अपनी मुहर लगा दे.

एक दौर में हिमालय के जिन तटवर्ती देशों में भारत का दबदबा हुआ करता था, जहां तिब्बत एक अलग देश के साथ भारत और चीन के बीच बफर स्टेट के रूप में भारत की सुरक्षा की कड़ी था, वह हमारी भूल की वजह से चीन की विस्तारवादी नीति का शिकार बन गया और हम यह सब होते हुए देखते रह गये. हम चीन की सर्वोच्चता को स्वीकार करते चले गये. नतीजा अत्यंत गंभीर असुरक्षा में बदल गया. नेपाल भी चीन के नजदीक पहुंच गया.

नेपाल और भारत की सीमाओं पर चीन का हस्तक्षेप बढ़ गया. भूटान और भारत का अभिन्न अंग जम्मू-कश्मीर भी इस बदलाव का शिकार बना. उस दौरान चीन ने हिमालय की तलहटियों से उतरते हुए अपने पंख भारत की समुद्री ठिकानों पर फैलाने शुरू कर दिये. दक्षिण एशिया से लेकर मध्य एशिया और अफ्रीका तक चीन का विस्तार होने लगा. साल 2013 में चीन ने वैश्विक आर्थिक विकास के नाम पर ओबीआर की शुरुआत की.

दुनिया की नजरों में चीन ऐतिहासिक शिल्क रूट की शुरुआत करने की बात कही, लेकिन यह आर्थिक ढांचा सैनिक समीकरण में बदलने लगा. चीन ने अमेरिकी तर्ज पर विदेशी भूमि पर सैनिक छावनी बनाने की पहल शुरू कर दी. अफ्रीका में भी चीन की सैनिक छावनी 2008 में बन कर तैयार हो गयी थी. पुनः अपने आर्थिक व्यापार की सुरक्षा के नाम पर चीन ने दक्षिण एशिया और हिंद महासागर के कई मुहानों पर अपने सैनिक बंदोबस्त को खड़ा कर दिया.

चीन की सैनिक छावनी की अगली कड़ी पाकिस्तान होगा, जैसा कि चीन के श्वेत पत्र- 2018 में इसका अंदेशा दिखता है. अब प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस पाने की कूवत रखता है?

भारत के लिए यह काम सहज और आसान नहीं होगा? तिब्बत हिमालय की मेरुदंड है और चीन के लिए दंत सुरक्षा, जिसकी बात माओत्से तुंग ने 1950 में कही थी. भारत की दूसरी मुसीबत अफगानिस्तान को लेकर है, जो निरंतर पाकिस्तान और चीन के कब्जे में खिसकता जा रहा है.

हिंद महासगर के तमाम देश चीन से मुक्त होकर भारत से जुड़ने की तमन्ना रखते हैं, लेकिन चीन की धमकी उन्हें ऐसा करने से रोकती है. चीन की नजर में भारत की भूमिका एक विरोधी की है. चीन भारत को नयी विश्व व्यवस्था में एक ऐसे देश के रूप में तब्दील करना चाहता है, जो कमजोर और याचना की मुद्रा में खड़ा हो, लेकिन चीन ऐसा कर पाने में सफल नहीं हो पा रहा है.

इस बात की पूरी उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी ने जो 2015 में श्रीलंका यात्रा के दौरान कहा था कि हिंद महासागर भारतीय विदेश नीति का सबसे मुख्य विषय है, इसको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अब इस बात की जरूरत आ गयी है कि चीन के मंसूबे को तोड़ने के लिए भारत नियोजित तरीके से काम करना शुरू कर दे.

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