[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home Opinion बुजुर्गों की बढ़ती संख्या

बुजुर्गों की बढ़ती संख्या

0
हमारे देश में कामकाजी आबादी की बड़ी तादाद होने के साथ बुजुर्गों की भी संख्या में बढ़ोतरी हो रही है. भारत की जनसंख्या की औसत आयु 28 साल है, जबकि चीन में यह 37 साल है. आकलनों की मानें, तो 2050 तक सबसे अधिक कामकाजी लोग भारत में होंगे.
लेकिन उस समय तक दुनिया की 20 फीसदी बुजुर्ग आबादी भी भारतीय होगी. अभी यह आंकड़ा 8.5 फीसदी है. ऐसे लोगों की मौजूदा आबादी अभी साढ़े दस करोड़ है. बुजुर्गों की दो श्रेणियां हैं- 60 साल से अधिक उम्र के लोग बुजुर्ग और 80 साल से अधिक उम्र के लोग बहुत बुजुर्ग माने जाते हैं.
एक सदी पहले श्रम बाजार की आर्थिकी के अनुरूप हुए इस श्रेणीकरण समय के बदलने के साथ सवाल भी खड़े हो रहे हैं, क्योंकि स्वास्थ्य, खान-पान और सक्रियता से बुजुर्गों के जीवन में सकारात्मक बदलाव हुए हैं. बुजुर्गों की बड़ी संख्या और उत्पादकता के स्तर के बीच का गणित भी बदल गया है. लेकिन ‘बिना खतरे के जन्म’ और ‘सम्मान के साथ मृत्यु’ विकासशील और निर्धन देशों के लिए अब भी एक अधूरा सपना है. हमारे देश में करीब 75 फीसदी बुजुर्ग आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में है और इसका एक बड़ा हिस्सा गरीबी के चंगुल में है.
इसका एक पहलू यह भी है कि बुजुर्गों में 55 फीसदी महिलाएं हैं, जिनके लिए स्वास्थ्य सेवाओं और देख-भाल की सुविधाओं को हासिल कर पाना बेहद मुश्किल होता है. अस्पतालों में औसतन एक हजार लोगों के लिए एक से भी कम बिस्तर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के मुताबिक यह अनुपात कम-से-कम 3.5 बिस्तरों का होना चाहिए. ऐसा ही अभाव स्वास्थ्य केंद्रों और चिकित्सकों व संबंधित कर्मियों के मामलों में है. बुढ़ापे में शारीरिक अक्षमता और देखने, सुनने व बोलने में परेशानी जैसी सामान्य समस्याओं के साथ गंभीर बीमारियों की मुश्किलें भी होती हैं. ऐसे में लगातार देख-भाल के साथ प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की जरूरत होती है.
परिवारों के बिखराव और रोजगार के लिए पलायन से भी परेशानी बढ़ रही है. कम आमदनी, बचत और पेंशन ने भी अधिक उम्र के बहुत लोगों को लाचार बना दिया है. ऐसे में बुजुर्गों के लिए घर पर ही जरूरी देख-रेख उपलब्ध कराने का विकल्प है. यदि घर पर ही स्वास्थ्यकर्मी ख्याल रखें, तो इसमें खर्च भी कम होता है और परिवार को भी परेशानी नहीं होती है. चीन में इस पहलू पर बहुत जोर दिया जा रहा है. इस संदर्भ में परिवार द्वारा खर्च को वहन करने की क्षमता तथा सरकार की पहलों की बड़ी भूमिका है.
यदि जन्म से ही लोगों, खासकर महिलाओं के स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त रखा जाये, तो बुढ़ापे में चिंता कम हो सकती है. प्राथमिक स्तर पर चिकित्सा सुविधाओं को बढ़ाकर ऐसा किया जा सकता है. बुजुर्गों के लिए प्रशिक्षित लोगों को तैयार कर रोजगार के मौके भी बनाये जा सकते हैं. हमारे बड़े-बुजुर्गों को उनकी उम्र के आखिरी पड़ाव पर एक अच्छा जीवन देना हम सबका व्यक्तिगत और सामूहिक कर्तव्य है.
ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel