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कुल्हड़ की वापसी

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क्षमा शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
kshamasharma1@gmail.com
पहले दुकानों पर छोटे-बड़े सभी प्रकार के कुल्हड़ दिखते थे. सबसे छोटे कुल्हड़ को कुलिया पुकारते थे. और जब कोई कम चाय देता था, तो कहते थे- अरे चाय ठीक से दो, ये क्या कि कुलिया में पकड़ा दी.
घरों में मिट्टी के बरतनों का अद्भुत संसार था. दूध उबालने, महेरी बनाने, रबड़ी बनाने, खीर पकाने, मट्ठा रखने आदि के लिए मिट्टी की हंडिया का उपयोग किया जाता था. रोटी रखने के लिए कटोरदान भी मिट्टी के होते थे.
लेकिन जैसे-जैसे घरों में धातु के बरतनों का प्रयोग बढ़ा, मिट्टी के बरतन बेदखल होते गये. इनकी उम्र भी कम होती है, इसलिए भी रोजमर्रा के जीवन से इनकी विदाई हो गयी. मगर कुल्हड़, सकोरे, घड़े, सुराही आदि का प्रयोग बना रहा. धीरे-धीरे घड़ों और सुराही की जगह फ्रिज और प्लास्टिक की बोतलों में मिलनेवाले पानी ने ले ली. प्लास्टिक की बोतलों को सफर में भी ले जाना आसान था. इसी तरह कुल्हड़ भी गये जमाने की बात हो गयी. कुल्हड़ में मिलनेवाली चाय या लस्सी से आनेवाली सौंधी खुशबू प्लास्टिक के गिलासों में कहां.
वैसे भी मिट्टी के खिलाफ दशकों से ऐसा अभियान चलाया गया, जैसे कि जीवन में जितने भी रोग हैं, उनको लानेवाली, फैलानेवाली मिट्टी ही हो. जबकि आम घरों में खून निकलने पर मिट्टी की पट्टी बांधी जाती थी. नकसीर फूट जाये, तो पीली मिट्टी पानी छिड़ककर सुंघायी जाती थी. प्राकृतिक चिकित्सा में तो मिट्टी काम आती ही थी. इसके अलावा हर पूजा-पाठ आदि में भी मिट्टी का ढेला जरूर रखा जाता था.
अब हाल यह है कि विशेषज्ञ कह रहे हैं कि बच्चे को अगर तमाम रोगों से बचाना है, तो उसे मिट्टी में खेलने दीजिये. मिट्टी में खेलने से उसकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है.
अमेरिका में मिट्टी से भरे ऐसे विशेष पार्क बनाये जा रहे हैं, जहां फीस चुकाकर बच्चे मिट्टी में खेल सकते हैं. घड़े का पानी पीने के फायदे बताये जा रहे हैं. एक तरफ अपने गांवों में पायी जानेवाली मिट्टी के बरतन की कला लुप्त सी हो गयी, वे कलाकार रोटी-रोजी के लिए कुछ और करने लगे. अब दोबारा उनकी मांग बढ़नेवाली है. यह अच्छा भी है. मिट्टी के बरतनों का प्रयोग बढ़ेगा, तो ये कलाकार भी जीवन पायेंगे. इनका जीवन भी आसान होगा.
जब से सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन लगा है और रेलवे ने कहा है कि अब रेलवे स्टेशनों और सफर में कुल्हड़ में चाय मिला करेगी, तब से जैसे बचपन में मैं सरपट दौड़ लगा रही हूं. लगता है कि जल्दी से किसी यात्रा पर निकल पड़ूं और कुल्हड़ में चाय पीकर बचपन में महसूस की मिट्टी की उसी अद्भुत गंध को दोबारा महसूस कर सकूं. जिस प्लास्टिक ने हमारे जीवन को बुरी तरह से घेर रखा है, बदले में तरह-तरह के रोग सौंपे हैं, पर्यावरण का विनाश किया है, नालियों को इतना बंद कर दिया है कि बाढ़ आ रही है, बहुत सी जगह नदियां ही नहीं प्लास्टिक के कूड़े के कारण समुद्रों का भी दम घुट रहा है, उस प्लास्टिक की विदाई अब जल्दी हो, तो बेहतर है.
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