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बापू और वर्तमान

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डेढ़ सदी पहले जन्मे और सात दशक पहले दिवंगत हो चुके महात्मा गांधी न केवल हमारे देश के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक और प्रेरणादायक बने हुए हैं. राष्ट्रपिता का जीवन और कर्म हमारे लिए एक नैतिक कसौटी हैं. ऐसा संयोगवश नहीं हुआ है. उनकी दुर्बल काया में स्थित असीम साहस और दृढ़ इच्छाशक्ति तथा वर्तमान में उनकी प्रासंगिकता को समझने के लिए उनके युग और आज के दौर को देखा जाना चाहिए.

बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में विश्व का आधुनिक इतिहास बेचैनी से करवटें ले रहा था. साम्राज्यवादी, उपनिवेशवादी, समाजवादी और राष्ट्रवादी विचारों के अलग-अलग संस्करण युद्धों, क्रांतियों एवं संघर्षों का अंतहीन कारण बने हुए थे. शोषण, दमन, घृणा और हिंसा से कराहती मानवता के लिए शांति और अहिंसा की मरहम लानेवाले गांधी ने मनुष्य की मुक्ति का द्वार खोला. तब ऐसी सोच रखना और उसे व्यवहार में उतारना एक सभ्यतागत चमत्कार ही था. भोग-उपभोग और दोहन पर टिकी आक्रामक आधुनिकता के बरक्स सादा जीवन जीने का ऐसा जीवट कहां कोई और दिखा सका! यह गांधी की अद्भुत नैतिकता ही थी, जिसकी वजह से वे न केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शीर्षस्थ योद्धा बने, बल्कि औपनिवेशिक दासता से पीड़ित देशों में भी उन्हें नायक माना गया.

वे धार्मिक और जातीय सद्भाव के पैरोकार रहे. अपनी संस्कृति से जुड़े रहे, पर अन्य सभ्यताओं से सीखने से कभी गुरेज नहीं किया. राजनीति को उन्होंने सामाजिक और रचनात्मक कार्यों से जोड़कर एक समेकित भविष्य की रूप-रेखा प्रस्तुत की. ऐसा करते हुए वे संवादधर्मिता भी निभाते रहे और लिखने-पढ़ने का काम भी बहुत किया.

अल्प मात्रा में आहार लेनेवाले उस महामानव की क्षमता के बारे में सोचा जाये- 1913 से 1948 के बीच उन्होंने लगभग 80 हजार किमी की यात्रा की, अपने जीवन में 35 हजार से अधिक पत्र लिखे, लगातार उपवास किया और जेल जाते रहे, भाषण देते रहे, लेख लिखते रहे. सामान्य स्वास्थ्य के लिए सलाह देने से लेकर जटिल धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दों पर उनके विचार स्पष्ट और सरल हुआ करते थे.

अचरज नहीं कि उन्हें राजनीतिक के रूप में भी देखा गया और आध्यात्मिक के रूप में भी. उन्हें कभी मिस्टर गांधी कहा गया, तो कभी महात्मा भी और राष्ट्रपिता भी. कटु आलोचनाओं और घोर असहमतियों के प्रति भी वे सम्मानपूर्ण रहे तथा घृणा और हमले का उत्तर भी प्रेम से दिया. आज देश और विश्व की दशा बीसवीं सदी के उन दशकों से भी कहीं अधिक खराब है.

विषमता, हिंसा और शोषण के साथ पर्यावरण के संकट ने मनुष्यता के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है. ऐसे में अब गांधी का जीवन-दर्शन किसी भी अन्य युग से कहीं अधिक प्रासंगिक है. हमारे ऊपर उनके व्यक्तित्व और उनकी स्मृति को दुष्प्रचार से कमतर करने की प्रवृत्तियों से बचाने का उत्तरदायित्व भी है.

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